Kohramlive Desk : Supreme Court ने गुरुवार को एक बड़ा फैसला सुनाया है। Supreme Court ने आज देश की सभी महिलाओं को गर्भपात का अधिकार दे दिया, चाहें वो विवाहित हों या अविवाहित। इस ऐतिहासिक फैसले में शीर्ष कोर्ट ने कहा कि मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी (MTP) एक्ट के तहत 24 सप्ताह में गर्भपात का अधिकार सभी को है। इस अधिकार में महिला के विवाहित या अविवाहित होने से फर्क नहीं पड़ता। जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़, जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस एएस बोपन्ना की बेंच ने ये फैसला दिया।
न्यायमूर्ति डी वाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली पीठ के अनुसार विवाहित महिलाएं भी यौन उत्पीड़न या बलात्कार की शिकार हो सकती हैं। आदालत ने ये भी कहा है की “एक महिला अपने पति द्वारा गैर-सहमति कार्य के कारण गर्भवती हो सकती है। सेक्स और लिंग आधारित हिंसा अपने सभी रूपों में परिवारों का हिस्सा रही है।” सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि महिलाओं को जरूरत नहीं है गर्भपात के लिए तीसरे पक्ष की अनुमति, विवाहित महिलाएं बलात्कार के उत्तरजीवी का हिस्सा बन सकती हैं। न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ ने कहा “हमने आईपीसी की धारा 375 पर भी संक्षेप में बात की है। बलात्कार के अर्थ में वैवाहिक बलात्कार का अर्थ पूरी तरह से शामिल होना चाहिए। एमटीपी अधिनियम और नियम। एमटीपी अधिनियम के उद्देश्य के लिए बलात्कार को साबित करने की ऐसी आवश्यकता अधिनियम के उद्देश्य के खिलाफ होगी।”
क्यों दिया सुप्रीम कोर्ट ने ये फैसला?
- दिल्ली हाईकोर्ट में 25 साल की एक महिला ने याचिका दायर कर अबॉर्शन की इजाजत मांगी थी। महिला ने कहा था कि वो अपने पार्टनर के साथ सहमति से रह रही थी, लेकिन अब उसने उससे शादी करने से मना कर दिया है और वो बिना शादी किए बच्चे को जन्म नहीं देना चाहती।
- दिल्ली हाईकोर्ट ने उस महिला को अबॉर्शन कराने की इजाजत नहीं दी थी। हाईकोर्ट ने कहा था कि चूंकि महिला अविवाहित है और अपनी सहमति से गर्भवती हुई है, इसलिए उसे अबॉर्शन कराने की इजाजत नहीं दी जा सकती। अगर अनुमति देते हैं तो ये बच्चे की हत्या के बराबर होगा।
- हाईकोर्ट ने 16 जुलाई को महिला की याचिका खारिज कर दी थी। उस समय वो 20 हफ्ते की गर्भवती थी। बाद में महिला सुप्रीम कोर्ट पहुंची। सुप्रीम कोर्ट ने महिला को अबॉर्शन कराने की इजाजत दे दी थी। सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि महिला अविवाहित है, सिर्फ इसलिए उसे अबॉर्शन कराने से नहीं रोका जा सकता।
- उस समय सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी कानून में 2021 में संशोधन हुआ था, जिसमें ‘पत्नी’ की जगह ‘पार्टनर’ शब्द का इस्तेमाल किया गया है। संशोधन के बाद विवाहित और अविवाहित महिला में अंतर नहीं रह जाता।
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