Chaibasa : चाईबासा से लेकर रांची तक इन दिनों खौफ का दूसरा नाम ‘कातिल हाथी’ है। यह दंतैल हाथी गुजरे 13 दिनों में 20 से ज्यादा लोगों की जान ले चुका है। तीन दिन से हाथी का कोई अता-पता नहीं, लेकिन डर अब भी गांव-गांव घूम रहा है। वन विभाग ने ड्रोन कैमरों से जंगल की खाक छान डाली, लेकिन हाथी घने जंगलों में कहीं गुम है। बीते तीन दिनों में उसने कोई हमला नहीं किया, मगर इससे राहत कम और आशंका ज्यादा है, क्योंकि यह हाथी मौका देखकर वार करता है। चाईबासा के DFO आदित्य नारायण ने मीडिया को बताया कि हाथी को काबू में करने के लिये आगरा से वाइल्डलाइफ SOS की विशेषज्ञ टीम पहुंच चुकी है। यह टीम ट्रैंकुलाइज यानी बेहोश कर पकड़ने में माहिर मानी जाती है। हाथी इतना आक्रामक क्यों हो गया, यह अब तक वेटेनरी डॉक्टर भी ठीक-ठीक नहीं बता पा रहे हैं। हाथी को मारने यानी न्यूट्रलाइज करने का फैसला सीधे नहीं होता इसके लिए वाइल्ड लाइफ वार्डन का आदेश और लंबी प्रशासनिक प्रक्रिया जरूरी होती है। इस मुद्दे पर झारखंड के वाइल्ड लाइफ सीसीएफ पारितोष उपाध्याय से संपर्क की कोशिश हुई, लेकिन कोई प्रतिक्रिया नहीं मिली।
1 जनवरी से शुरू हुआ मौत का सिलसिला
इस हाथी का आतंक 1 जनवरी से शुरू हुआ। टोंटो के बांडीझारी गांव में मंगल सिंह हेंब्रम, बिरसिंहहातु के उर्दूप बहंद, रोरो गांव के विष्णु सुंडी तीनों को कुचल डाला। इसके बाद नोवामुंडी के बाबरिया गांव में तो जैसे कयामत टूट पड़ी,
एक ही परिवार के 5 लोगों को मार डाला। इसमें पति-पत्नी, दो मासूम बच्चे और एक अन्य परिजन शामिल हैं। एक बच्चा किसी तरह जान बचाकर भाग सका। वन अधिकारियों के अनुसार, यह हाथी झुंड से बिछड़ गया है, रोज करीब 30 किलोमीटर चल रहा है। लगातार मूवमेंट के कारण लोकेशन ट्रैक करना मुश्किल है। बीच में जो आया वो गया। बेनीसागर, खड़पोस, नोवामुंडी और सीमावर्ती इलाकों में लोग अकेले सोने से डर रहे हैं। 15–20 लोग एक ही घर में रात काट रहे हैं। महिलाएं और बच्चे दूसरे गांव भेज दिये गये। पुरुष मशाल और टॉर्च लेकर पहरा दे रहे हैं। ओडिशा सीमा से सटे करीब 30 गांवों को हाई अलर्ट पर रखा गया है। वन विभाग की गश्ती टीमें दिन-रात निगरानी में जुटी हैं।










