UP : महज तीन महीने के एक मासूम के पेट में जब डॉक्टरों ने जांच की, तो जो तस्वीर सामने आई उसने अनुभवी चिकित्सकों को भी हैरान कर दिया। बच्चे के पेट में एक आठ सप्ताह का भ्रूण विकसित हो रहा था। बाल, हड्डियां और अंगुलियां तक बन चुकी थीं। बरेली के एक निजी अस्पताल में सफल सर्जरी के बाद इस दुर्लभ भ्रूण को बाहर निकाला गया। डॉक्टरों के अनुसार, यह बेहद दुर्लभ चिकित्सकीय स्थिति ‘फीटस इन फीटू’ (Fetus in Fetu) कहलाती है। दुनियाभर में पिछले एक दशक में ऐसे करीब 300 मामले ही सामने आये हैं। बरेली में यह दूसरा मामला बताया जा रहा है।
दूध नहीं पच रहा था, जांच में सामने आई चौंकाने वाली सच्चाई
मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, शाहजहांपुर जिले के कलान निवासी किसान दुर्गेश और राधा के तीन महीने के बेटे मंजेश को कई दिनों से दूध पचाने में परेशानी हो रही थी। परिजनों ने जब उसके पेट में छाती के नीचे गांठ महसूस की, तो उसे जांच के लिये एक निजी मेडिकल कॉलेज ले जाया गया। जांच में पता चला कि बच्चे के लिवर के नीचे एक भ्रूण मौजूद है, जिसमें बाल, हड्डियां और अंगुलियां विकसित हो रही थीं। मामले की जटिलता को देखते हुये वहां ऑपरेशन नहीं किया गया। इसके बाद परिजन बच्चे को बरेली के रामपुर गार्डन स्थित निजी अस्पताल लेकर पहुंचे। पीडियाट्रिक सर्जन डॉ. राजीव अग्रवाल ने मीडिया को बताया कि करीब 13 वर्ष पहले भी उन्होंने ऐसा ही एक दुर्लभ ऑपरेशन किया था। उसी अनुभव के आधार पर उन्होंने इस बार भी सर्जरी करने का निर्णय लिया। करीब दो घंटे तक चले ऑपरेशन के बाद बच्चे के पेट से आठ सप्ताह का भ्रूण सफलतापूर्वक निकाल लिया गया। सर्जरी सफल रही और बच्चे की स्थिति अब बेहतर बताई जा रही है।
क्या है ‘फीटस इन फीटू’?
डॉक्टरों के अनुसार, फीटस इन फीटू एक अत्यंत दुर्लभ जन्मजात चिकित्सकीय स्थिति है। यह तब होती है, जब गर्भावस्था के शुरुआती दौर में जुड़वां भ्रूण बनने की प्रक्रिया के दौरान एक भ्रूण दूसरे भ्रूण के भीतर समा जाता है और उसका सामान्य विकास रुक जाता है। यह स्थिति लगभग पांच लाख जन्मों में एक बच्चे में देखने को मिलती है। अधिकांश मामलों में यह भ्रूण पेट के निचले हिस्से में पाया जाता है, जबकि इस बच्चे में यह लिवर के नीचे दाईं ओर (राइट हाइपोकॉन्ड्रियम) मिला, जो और भी दुर्लभ माना जाता है। विशेषज्ञों का कहना है कि इस तरह के मामले बेहद कम देखने को मिलते हैं। समय पर सही जांच और विशेषज्ञ सर्जरी के कारण बच्चे का सफल इलाज संभव हो सका। यह मामला चिकित्सा विज्ञान के लिये भी एक महत्वपूर्ण और दुर्लभ उदाहरण माना जा रहा है।
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