Ranchi : झारखंड की ओपन कास्ट कोयला खदानों ने धरती के उस प्राचीन इतिहास का दरवाजा खोल दिया है, जो न इंसानों के समय का है और न डायनासोर के युग का। नॉर्थ कर्णपुरा स्थित अशोका कोयला परियोजना से मिले जीवाश्मों ने करीब 28–30 करोड़ वर्ष पहले के घने दलदली जंगलों, नदियों और समुद्री अतिक्रमण के प्रमाण दिये हैं। इस बहु-विषयक अध्ययन का नेतृत्व बीरबल साहनी जीवाश्म विज्ञान संस्थान (BSIP) के वैज्ञानिकों ने किया, जबकि शोध निष्कर्ष अंतरराष्ट्रीय जर्नल इंटरनेशनल जर्नल ऑफ कोल जियोलोजी में प्रकाशित हुये हैं।
गोंडवानालैंड के प्राचीन जंगलों का पुनर्निर्माण
वैज्ञानिकों के अनुसार, पर्मियन काल (लगभग 28–30 करोड़ वर्ष पूर्व) में भारत, अंटार्कटिका, दक्षिण अफ्रीका, दक्षिण अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया मिलकर ‘गोंडवानालैंड’ नामक महाद्वीप का हिस्सा थे। उस समय झारखंड का यह क्षेत्र घने दलदली वनों और नदियों से आच्छादित था, जिन पर समय-समय पर समुद्र के अतिक्रमण के भी संकेत मिलते हैं। अशोका कोल माइंस से मिले जीवाश्मों में विलुप्त बीज-पौधों के समूह ‘ग्लोसोप्टेरिस’ की भरमार पाई गई है। शेल परतों में 14 से अधिक प्रजातियों के पत्ते, जड़ें, बीज और पराग कण सुरक्षित मिले हैं। सबसे अहम खोज ग्लोसोप्टेरिस का किशोरावस्था का नर शंकु (juvenile male cone) है, जिसे वनस्पति विज्ञान की ‘मिसिंग कड़ी’ माना जा रहा है। इससे वैज्ञानिक यह समझ सकेंगे कि ये प्राचीन वृक्ष किस तरह प्रजनन करते थे।
समुद्र के अतिक्रमण के ठोस प्रमाण
मीडिया में आई खबर के अनुसार, कोयले और शेल नमूनों की सूक्ष्म जांच में ‘फ्राम्बॉइडल पाइराइट’ जैसे खनिज कण और उच्च सल्फर स्तर मिले हैं। यह संकेत देता है कि उस समय दलदली इलाकों में खारे पानी की स्थिति मौजूद थी, जो सामान्य कोयला जमाव में दुर्लभ मानी जाती है। गैस क्रोमैटोग्राफी-मास स्पेक्ट्रोमेट्री (GC-MS) विश्लेषण से पता चला कि पर्मियन काल में समुद्र पूर्वोत्तर भारत से होते हुए मध्य भारत की ओर बढ़ा और दामोदर बेसिन तक पहुंच गया था।यह खोज केवल भूगर्भीय इतिहास तक सीमित नहीं है, बल्कि आज के जलवायु संकट से भी जुड़ी चेतावनी देती है। वैज्ञानिकों का कहना है कि जैसे पर्मियन काल में समुद्र स्तर बढ़ने से भूभाग प्रभावित हुये थे, उसी तरह आज ध्रुवीय बर्फ के पिघलने से बढ़ता समुद्री स्तर भविष्य में तटीय और आंतरिक क्षेत्रों को प्रभावित कर सकता है।
अध्ययन का उद्देश्य और वैश्विक महत्व
नॉर्थ कर्णपुरा बेसिन का अध्ययन प्राचीन वनस्पति, पारिस्थितिकी और निक्षेपण परिस्थितियों को समझने के लिये किया गया। यह क्षेत्र लोअर गोंडवाना अनुक्रमों में संरक्षित विविध पौध जीवाश्मों का महत्वपूर्ण भंडार माना जाता है। अपने उत्कर्ष काल में गोंडवाना भूभाग पृथ्वी की सतह के लगभग 16% हिस्से पर फैला हुआ था, जिससे यह वैश्विक भूवैज्ञानिक अध्ययनों का प्रमुख केंद्र बनता है।
गोंडवाना विघटन और बने कोयला भंडार
पर्मियन काल में भारतीय उपमहाद्वीप दक्षिणी अक्षांशों (20°–45°) के बीच स्थित था। गोंडवाना महाद्वीप के विघटन, ज्वालामुखीय गतिविधियों और टेक्टोनिक परिवर्तनों के कारण वातावरण में कार्बन डाइऑक्साइड बढ़ी, हिमनद पिघले और समुद्र स्तर में वृद्धि हुई। इन्हीं प्रक्रियाओं के बाद भारत में विशाल कोयला भंडार बने, जो आज ऊर्जा का प्रमुख स्रोत हैं।








