7 खटिया की रस्सी से भी नहीं मिला गहराई का थाह # शिवलोक धाम

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जानें, कैसे मुर्गा के बांग देने से पहले तैयार हो गया शिवलोक धाम

रांची : कुछ चीजें ऐतिहासिक अनुभवों के परे होती हैं। कई बार इन्हें आत्मसात करने के लिए सीमाओं के पार जाना होता है, लेकिन क्या ही अच्छा हो कि अपने शहर में ही कुछ दिव्यतायें ढूंढ़ी जायें और अगर वे मिल जायें, तो कैसा एहसास होगा। झारखण्ड की राजधानी रांची से महज 15 किलोमीटर दूर एक ऐसा शिवलोक धाम है, जिसकी ख्याति शिवभक्तों को बार-बार खींच लाती है, लेकिन शहर का अधिकांश जनमानस इस दिव्य धाम का आज भी दर्शन नहीं कर पाया है। शिव की कई निशानियां खुले में औचक पड़ी हैं। आस्थावान इन निशानियों के अक्स अपनी आंखों में लेकर शिव के जाप में लीन रहते हैं, लेकिन सरकार की एक नजर के बिना यह धाम पहाड़ के ऊपर ही किसी बियावान में एक पथिक की तरह पड़ा है।

शिवलोक धाम राजाउलातू पंचायत के उनीडीह गांव में स्थित है। यहां 280 एकड़ में फैले विशाल मरासिली पहाड़ पर सदियों पुराना एक शिव मंदिर और कुछ रहस्यमयी कुंड हैं। शिव मंदिर के बारे में किंवदंती है कि इसे देव शिल्पी भगवान विश्वकर्मा ने रातोंरात बनाया था। पौराणिक कथा का वर्णन करते हुए मंदिर के मुख्य पुजारी वीरेश पाठक कहते हैं कि मंदिर निर्माण के दौरान ही सुबह हो गयी और मुर्गे ने बांग दे दी। भगवान विश्वकर्मा ने मंदिर निर्माण अधूरा ही छोड़ दिया। मंदिर की दीवारें तो तैयार हो गयीं, लेकिन छत पूरी न हो सकी। बाद में जब श्रद्धालु पूजा-पाठ करने लगे, तो आसपास के ग्रामीणों ने मरासिली ट्रस्ट का गठन किया। ट्रस्ट ने ही मंदिर के गुंबद का निर्माण करवाया। कहा जाता है कि शिवलोक धाम का वातावरण इतना शीतल और पवित्र है कि गर्मी में भी इसके अंदर शीतलता बनी रहती है। मंदिर की दीवारें लगभग तीन फीट मोटी हैं और पूर्व में इन पर बेहतरीन कलाकृतियां उकेरी हुई थीं, जो गुंबद निर्माण के दौरान प्लास्टर से ढंक गयीं।

मरासिली पहाड़ का नामकरण

मरासिली पहाड़ के नामकरण का इतिहास भी बड़ा रोचक है। स्थानीय लोग आस्थापूर्वक बताते हैं कि एक बार महर्षि बाल्मीकि यहां से गुजर रहे थे। उन्हें यह जगह रास आयी और वे यहीं बैठ कर तप करने लगे। उनके श्रीमुख से मरा-मरा का जाप हो रहा था। इसके बाद ही पहाड़ का नाम मरासिली बुलाया जाने लगा।

आस्था के कुंड

बाग्लामुखी कुंड-पहाड़ पर कई रहस्यमय कुंड हैं, जिनमें से एक बाग्लामुखी कुंड है। कुंड के अंदर माता की पिंडी स्थापित है और एक शिवलिंग भी है, जो दो खंड में बंटा हुआ है। पानी कम होने पर शिवलिंग दिखता है। शिवलिंग का एक टुकड़ा पास के गांव के एक महर्षि के पास है, जिसकी वे नियमित पूजा-पाठ करते हैं। कुंड की गहराई करीब बीस फीट है और इसका आकार शिवलिंग के अरघा की तरह दिखता है।

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शिवगंगा धाम कुंड-पहाड़ का दूसरा और सबसे बड़ा कुंड शिवगंगा धाम कुंड कहलाता है। इसका पानी कभी नहीं सूखता। इसकी गहराई नापी नहीं जा सकी है। एक बार लोगों ने गहराई नापने का प्रयास किया, लेकिन सात खटिया की रस्सी डालने के बाद भी गहराई का पता नहीं चल पाया। इस कुंड में मौजूद एक गुफा के बारे में कहा जाता है कि इसमें नारियल डालने पर जगन्नाथपुर में निकलता था। वहीं एक अन्य गुफा का जुड़ाव बागलामुखी कुंड से है।

चर्म रोग दूर करने वाला चमत्कारी कुंड- पर्वत पर शिवगंगा धाम में एक अन्य चमत्कारी कुंड है, जिसके बारे में मान्यता है कि इसमें स्नान करने से चर्म रोग दूर हो जाता है।

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त्रिनेत्र कुंड – एक अन्य कुंड का आकार शिव के त्रिनेत्र की तरह है। लोग इसे शिव का त्रिनेत्र मान कर इसी भाव से इस कुंड की भी पूजा करते हैं। यहां एक 20 फीट गहरा और 15 फीट गुफानुमा कुंड है, जिसकी भी श्रद्धालु पूजा करते हैं।

मनोकामना पूरण कुंड- कुंडों के इस पावन स्थल पर सबसे अद्भुत मनोकामना पूरण कुंड है, जिसके बारे में कहा जाता है कि जो लोग आंख बंद कर निर्धारित दूरी से आकर इस कुंड को अपने हाथों से ढंक देते हैं, उनकी मनोकामना पूर्ण होती है। कई स्थानीय लोगों ने अपनी मनोकामना पूर्ण होने के अनुभव सुनाए।

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धरोहर की उपेक्षा

इतनी पुरातन आस्था की इस विरासत को सरकार और तंत्र पहचान नहीं पाया। राज्य बनने के 20 साल के बाद भी शहर की गोद में स्थापित इस अनमोल विरासत का समग्र विकास सिर्फ आश्वासनों के भरोसे ही है। मरासिली पहाड़ ट्रस्ट के सदस्य बताते हैं कि रघुवर सरकार में पर्यटन मंत्री रहे अमर कुमार बाउरी ट्रस्ट के आमंत्रण पर एक बार यहां आये थे। यहां की खूबसूरती, धार्मिक आस्था एवं प्राकृतिक परिवेश देख कर वे मंत्रमुग्ध रह गये। उन्होंने भाव विह्वल अंदाज में सदस्यों से कहा कि मंदिर परिसर को विकसित करने में वे अपनी पूरी ऊर्जा लगा देंगे। यहां तक पहुंचने के लिए बेहतर सड़क बनायी जायेगी। लेकिन आश्वासनों का पुलिंदा थमा कर लौटने के बाद उन्होंने कभी इसकी सुध नहीं ली। ट्रस्ट के सदस्यों को उम्मीद है कि सरकार पौराणिक मान्यताओं और आस्था से जुड़ी इस धरोहर को पर्यटन स्थल के रूप में विकसित करेगी। अगर ऐसा हुआ तो स्थानीय लोगों को रोजगार तो मिलेगा ही, साथ ही झारखण्ड धार्मिक विरासत के मानचित्र पर और प्रखरता से उभरेगा। हम सभी को उस दिन का इंतजार है।

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