Chaibasa (Karamvir Sharma) : अगर जिंदगी खुदा की रहमत है तो जीना इस कदर दुश्वार क्यों? जिल्लत,जलालत और अपमान भरी जिंदगी से परेशान 61 लड़कियां देर रात ठंड में हॉस्टल छोड़ बाहर निकल गयी। दुख-दर्द ऐसा कि घनघोर रात में बिना किसी डर-भय के भूखे प्यासे करीब 17 किलोमीटर पैदल चल डीसी के दफ्तर तक पहुंच गयीं। छात्राओं का दुख-दर्द जिसने भी जाना सुना, उनका दिल दरक गया। हर किसी की जुबां से एक ही शब्द निकला, यह तो हद है।
उनका दुख यह था कि जिस हॉस्टल में वह रहती है वहां उन्हें बासी भोजन परोसा जाता है। भर पेट खाना तक नहीं मिलता। क्लास टाइम में बाथरूम साफ करने को कहा जाता है। गलती से अगर कोई नाला जाम मिला तो फाइन अलग से थोप दिया जाता है। यह दुखड़ा है पश्चिम सिंहभूम के कस्तूरबा गांधी आवासीय बालिका विद्यालय, खुंटपानी में पढ़ने वाली छात्राओं का। मां-बाप से कोसों दूर सरकारी स्कूल में पढ़ने आई इन बेटियों का दर्द जब झलका तो डीसी दफ्तर के लोग तक हिल गए।
DSE अभय कुमार ने कहा यह दुखद है। पूरे मामले की जांच करा दोषियों को बख्शा नहीं जायेगा। सांसद प्रतिनिधि त्रिशाणु रॉय ने कहा कि रात के अंधेरे में एक साथ इतनी लड़कियों का स्कूल परिसर से बाहर आ जाना चौंकाता है। उन्हें रोकने-टोकने और देखने वाला तक कोई नहीं। यह दुखद है। स्कूल परिसर में टॉर्चर हो रही कुछ लड़कियों का कहना था कि सरकार ने उनके लिए सारी सुविधा दे रखी है। फिर भी ना जाने क्यों उन्हें मेन्यू के हिसाब से ना नाश्ता मिलता है, ना खाना। बाथरूम साफ करें या क्लास करें। कोई एक भी छूटता है तो जुर्माना देना पड़ता है। मार अलग पड़ती है। क्लास टीचर क्लास मिस करने का लिखित आवेदन मांगते हैं। उन्हें क्या लिखकर दें, माथा काम नहीं करता। इसलिए रात भर पैदल चलकर सीधे डीसी सर के पास आई हूं, शायद सबका भला हो जाए।
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