Kohramlive : 14 फरवरी… मोहब्बत के रंगों में सराबोर यह तारीख, लेकिन छह साल पहले इसी दिन एक बर्फीली सुबह ने देश को गहरे घाव दे दिये थे। घाटी की ठंडी हवाओं में बारूद की गंध घुल गई थी और आसमान वीर सपूतों की अंतिम चीखों से कांप उठा था। पुलवामा की धरती लहूलुहान थी, और हवा में केवल एक ही गूंज थी…”भारत माता की जय!”
CRPF के 40 रणबांकुरे… जो घर से वादा कर निकले थे कि जल्द लौटेंगे, मगर उनकी वापसी सिर्फ तिरंगे में लिपटी थी। किसी मां की आंखें पथरा गईं, किसी पिता के कंधे बोझिल हो गये, किसी नन्हे ने पहली बार जाना कि ‘शहीद’ क्या होता है, किसी सुहागन की चूड़ियां एक पल में टूटकर बिखर गईं। वो सुबह आम नहीं थी… जम्मू-श्रीनगर हाईवे पर CRPF का काफिला गुजर रहा था, और तभी… एक घात लगायी साजिश, एक गूंजता धमाका, एक झटके में बिखरते सपने! बस के परखच्चे उड़ चुके थे, और चारों ओर बस राख और चीखें थीं। इस हमले की साजिश में मसूद समेत 19 दरिंदे थे। छह को मौत मिली, मगर बाकी अभी भी छिपे बैठे हैं। इनमें से पांच पाकिस्तान में साजिशों का जहर घोल रहे हैं, और आठ जेल की सलाखों के पीछे कैद हैं। लेकिन क्या यह इंसाफ पूरा हुआ? नहीं, क्योंकि अभी भी हर शहीद की मां की आंखें अपने लाल की राह तक रही हैं, हर घर में उनकी यादें सांस ले रही हैं।
पंकज कुमार त्रिपाठी, तिलक राज, अजीत कुमार आज़ाद, प्रदीप सिंह, अश्वनी कुमार, श्याम बाबू… और न जाने कितने वीर, जो अपने नाम अमर गाथा लिख गये। कोई छुट्टी से लौटकर गया था, किसी ने ड्यूटी के पहले घर फोन किया था, किसी ने अपने नन्हे बच्चे को पहली बार गोद में लिया था। मगर नियति को कुछ और ही मंजूर था। आज छह साल बाद भी, पुलवामा का दर्द धड़कनों में ज़िंदा है। यह न केवल शहादत की कहानी है, बल्कि एक प्रण भी है—जो हमारे अपनों को छीन ले गये, उन्हें उनके अंजाम तक पहुंचाना ही असली न्याय होगा।
“तुम सिर्फ एक विस्फोट से हमें मिटा नहीं सकते, हम हर शहीद की चिता से नये दीप जलायेंगे… और ये दीप जलते रहेंगे, जब तक न्याय का सूरज नहीं उगता!”
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