Garhwa(Nityanand Dubey) : धूप ढल चुकी थी। हवा में महुआ की मादक गंध अब उतनी तीव्र नहीं थी, जितनी कभी दुलदुलवा के लोगों की नशे की लत हुआ करती थी। लेकिन उस दिन कुछ बदला-बदला सा था। पीपल के नीचे बने पुराने चबूतरे पर एक नया दृश्य सजा था। वहां कोई पुलिसिया छापेमारी नहीं हो रही थी, ना ही कोई औरत आंचल से आंसू पोछती दिख रही थी। वहां बैठे थे, SDO संजय कुमार, जिनकी आंखों में गुस्सा नहीं, पर एक गहरी चिंता थी.. उस गांव के लिये, जो किसी समय बदनाम हो चुका था, “नशे का अड्डा” कहलाकर। “भइया…” सामने बैठे बुज़ुर्ग ने कांपती आवाज में कहा, “पहले अफसर लोग डराने आते थे, आप समझाने आये हैं। हम मान गये। अब हम नशा छोड़ देंगे, और अपने पोता को स्कूल भेजेंगे।” SDO की आंखों में चमक आई, वही चमक जो किसी पिता की आंखों में तब आती है जब बेटा पहली बार चलना सीखता है।
धंधे की दीवार में दरार
गांव की औरतें अब अपने पति को शराब लाने नहीं, खेत जोतने भेज रही थीं। बच्चे, जिनके हाथों में कभी बोतलें थीं, अब उन्हीं हाथों से स्कूल की कॉपियां पकड़ने लगे थे। गांव की रमिया कहती है, “हमरा आदमी अब नशा छोड़ के मोबाइल रिपेयरिंग सीख रहल हे। साहेब अईसन बात किये कि उनकर दिल में कुछ गड़बड़ हो गेल और सीधा हो गेल।” यह कोई चमत्कार नहीं था, यह था निरंतर संवाद, स्नेह और संकल्प का असर।
जो कभी गुनहगार थे
अब जो पहले शराब के गटर में धंसे थे, वो गांव के मंच पर खड़े होकर कहते हैं, “भाइयों… बहनों… हमसे गलती हुई। लेकिन अब हम नहीं चाहेंगे कि हमारे बच्चे भी वही गलती करें।” SDO ने कहा, “इन्हें दोषी नहीं, प्रेरणा बनाइये। इनका हाथ थामिये, धिक्कारिये मत।” गांव ने पहली बार ताली से किसी पूर्व शराब विक्रेता का स्वागत किया था। अब चौपाल में नशा नहीं बिकता, वहां कसमें बिकती हैं। कसम अपने बच्चों की कि अब शराब नहीं बनायेंगे। कसम मां की कि अब किसी की बेटी विधवा नहीं होगी इस जहर से। कसम खुदा, भगवान, बंसीधर की कि अब गांव बदलेगा। वह गांव जिसे देख पुलिस पहले चुपचाप निकल जाती थी, अब वहां DC, SP और अधिकारी बैठते हैं, क्योंकि वहां से अब “खबर” नहीं, “उम्मीद” निकलती है। बच्चे अब पेंसिल से अक्षर गढ़ते हैं, और बूढ़े अपनी आंखों से बदलाव की रोशनी देख रहे हैं।














