जब ‘नाना’ की मौजूदगी से गुलजार हुआ था बेतला…

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Palamu : रुपहले पर्दे पर अपनी दमदार आवाज और बेहतरीन अदाकारी से करोड़ों दिलों पर राज करने वाले नाना पाटेकर का पलामू से भी एक खास रिश्ता रहा है। करीब चार दशक पहले जब पलामू आज की तरह सुविधाओं से लैस नहीं था, तब यह इलाका एक फिल्म की शूटिंग का गवाह बना था। जंगल, पहाड़ और राजघराने की पुरानी विरासत के बीच फिल्मी सितारों की चहल-पहल ने उस दौर में पलामू की तस्वीर ही बदल दी थी। बताया जाता है कि 1987-88 में नाना पाटेकर फिल्म ‘आज का रॉबिन हुड’ की शूटिंग के लिये पलामू पहुंचे थे। फिल्म की शूटिंग अविभाजित पलामू के बेतला नेशनल पार्क और गढ़वा के रंका राज परिवार के गढ़ में हुई थी। शूटिंग के सिलसिले में नाना पाटेकर और फिल्म की टीम कई दिनों तक पलामू में रुकी थी।

जब जंगल में गूंजा था कैमरा…

आज बेतला नेशनल पार्क पर्यटकों की पसंदीदा जगहों में शामिल है, लेकिन उस दौर में यहां फिल्मी सितारों का पहुंचना अपने आप में बड़ी बात थी। शूटिंग के दौरान नाना पाटेकर और फिल्म की टीम ने बेतला के जंगलों में हथिनी अनारकली और जूही की सवारी भी की थी। फिल्म में चर्चित अभिनेता उत्पल दत्त भी उनके साथ थे। उस समय पलामू में संचार और दूसरे आधुनिक संसाधन सीमित थे। ऐसे में किसी बड़े अभिनेता का कई दिनों तक यहां रहना स्थानीय लोगों के लिये यादगार अनुभव बन गया था। खबर है कि फिल्म की शूटिंग रंका राज परिवार के यहां भी हुई थी। उस समय युवराज गुलाब सिंह खुद इलाहाबाद में पढ़ाई कर रहे थे। फिल्म की शूटिंग की खबर जैसे-जैसे लोगों तक पहुंची, नाना पाटेकर को देखने और मिलने की उत्सुकता भी बढ़ने लगी। नाना ने भी लोगों से बेहद सहज अंदाज में मुलाकात की। बातचीत की और तस्वीरें भी खिंचवाईं। उस दौर में किसी बड़े फिल्म कलाकार का इस तरह आम लोगों के बीच सहजता से घुलना-मिलना लोगों के लिये खास अनुभव था। उस वक्त न मोबाइल का दौर था, न सोशल मीडिया और न ही हर घटना कैमरे में कैद हो जाती थी। इसलिये करीब चार दशक पुरानी उस फिल्म शूटिंग की यादें आज मुख्य रूप से स्थानीय लोगों, पत्रकारों और उन लोगों की जुबानी बची हैं, जिन्होंने नाना पाटेकर को पलामू की धरती पर करीब से देखा था। बेतला का जंगल, हथिनी अनारकली और जूही की सवारी, रंका राजघराने का गढ़ और शूटिंग के बीच लोगों से सहज मुलाकात, नाना पाटेकर की पलामू यात्रा की ये यादें आज भी इस इलाके की पुरानी फिल्मी यादों का हिस्सा हैं। पर्दे पर नाना पाटेकर की आवाज भले ही आज खामोश हो गई हो, लेकिन पलामू के जंगलों में चार दशक पहले उनकी मौजूदगी की वह कहानी आज भी स्थानीय लोगों की यादों में उसी तरह जिंदा है।

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