Ranchi : रांची की दोपहर तप रही थी, लेकिन झारखंड की सियासत उस दोपहर से कहीं ज्यादा तपती नजर आई। राजधानी के सन्नाटे में हेमंत सरकार का एक फैसला गूंज उठा, डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी विश्वविद्यालय अब वीर बुधु भगत विश्वविद्यालय कहलायेगा। किसी ने ताली बजाई, किसी ने कहा यह गलत परपंरा की शुरूआत। राजनीति के दो ध्रुव आमने-सामने आ गये। एक तरफ भाजपा, जिसे लगा जैसे इतिहास की इमारत से एक नाम को मिटा दिया गया। दूसरी ओर झामुमो और कांग्रेस, जिन्होंने इसे धरती पुत्र के मान का पुनर्जन्म कहा। भाजपा के दिग्गज नेता बाबूलाल मरांडी की आवाज में तंज भी था और चिंता भी। उन्होंने कहा, “इस फैसले से न वीर बुधु भगत को सम्मान मिलता है, न डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी को न्याय।” वहीं, झामुमो प्रवक्ता मनोज पांडेय ने मीडिया से कहा कि “1857 से पहले भी क्रांति हुई थी। बुधु भगत ने वह चिंगारी सुलगाई थी। जब वे जेल गये, तब अंग्रेजों ने ₹100 का इनाम रखा था। आज अगर हम उन्हें नाम में जगह दे रहे हैं तो पेट में दर्द क्यों?” भाजपा के वरिष्ठ नेता प्रदीप सिन्हा ने इसे वोट बैंक की राजनीति कहा, बोले “जब सरहद पर ऑपरेशन सिंदूर चल रहा है, तब राज्य सरकार इस तरह की विभाजनकारी सोच में व्यस्त है।”




