Kohramlive : लद्दाख के सियाचिन ग्लेशियर से मंगलवार को आई खबर ने पूरे देश का दिल दहला दिया। दुनिया के सबसे ऊंचे युद्धक्षेत्र पर डटे सैनिकों में से तीन वीर हिमस्खलन की चपेट में आकर शहीद हो गये। शहीदों में सिपाही मोहित कुमार, अग्निवीर नीरज कुमार चौधरी और अग्निवीर डाभी राकेश देवभाई शामिल हैं। बचाव दल ने तुरंत मोर्चा संभाला और अन्य सैनिकों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाया, लेकिन भीषण बर्फबारी के बीच यह हादसा अपूरणीय क्षति बन गया। सियाचिन सिर्फ एक ग्लेशियर नहीं, बल्कि जंग का सबसे कठिन मोर्चा है। यहां तापमान माइनस 60 डिग्री सेल्सियस तक गिर जाता है। सैनिकों को फ्रॉस्टबाइट, सांस की तकलीफ और दिमागी सूनापन जैसी घातक चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। बर्फ के बीच जमे हुये कदम, ठंडी हवाओं से जूझते सीने और हर पल मौत का साया, यही है सियाचिन। इन तीन बलिदानियों की शहादत हमें याद दिलाती है कि सियाचिन सिर्फ बर्फ का रेगिस्तान नहीं, बल्कि त्याग, वीरता और अटूट संकल्प का प्रतीक है।
1984 से अब तक, मेघदूतों का पराक्रम
1972 के शिमला समझौते के बाद सियाचिन को बंजर माना गया था। लेकिन जब 1984 में पाकिस्तान ने कब्जे की साजिश रची, तो भारत ने ऑपरेशन मेघदूत चलाकर दुश्मन की चाल नाकाम कर दी। तब से लेकर आज तक भारतीय सेना इस सफेद रणभूमि पर हर मौसम, हर कठिनाई को मात देती आई है। यह क्षेत्र पाक अधिकृत कश्मीर (PoK), अक्साई चिन और शक्सगाम घाटी से सटा है। यहां तैनाती भारत को दुश्मनों की गतिविधियों पर नजर रखने की सामरिक क्षमता देती है। लेह से गिलगित जाने वाले रास्तों पर नजर रखना भारत की सुरक्षा के लिये बेहद महत्वपूर्ण है।












