Hazaribagh,(Chouparan), (Krishna Paswan) : झारखंड की घने जंगलों में बसी एक छोटी-सी बस्ती जमुनियातरी, जहां अब तक चूल्हे की आंच, पत्तों की झोंपड़ी और आजीविका की तंग गलियों में ही जिंदगी सिमटी थी, अचानक से खुशियों के गीतों से गूंज उठी। और इसकी वजह बनीं बिरहोर जनजाति की दो बेटियां किरण कुमारी और चानवा कुमारी। किरण ने लहराया उजाले का परचम मैट्रिक में 409 अंक (80%) लाकर एवं चानवा ने रचा इतिहास 332 अंक (66%) हासिल कर। ये संघर्ष की तपिश में पक कर निकली संभावनाओं की चिंगारियां हैं।
जिस समाज में पढ़ाई से पहले पेट भरने की चिंता होती है, वहां इन बच्चियों ने कस्तूरबा गांधी आवासीय विद्यालय चौपारण में वो सपना देखा, जिसमें झोपड़ी की बेटियां भी डॉक्टर, टीचर और अफसर बन सकती हैं। इस विद्यालय ने किताबों से एक नई दुनिया का दरवाजा खोला और किरण-चानवा ने उस दरवाजे से होकर बाहर निकल, पूरे झारखंड को बता दिया कि “हम भी उड़ सकते हैं… अगर कोई हमें पर दे।” हजारीबाग के DC शशि प्रकाश सिंह ने दोनों बेटियों को आशीर्वाद देते हुये कहा, “ये सिर्फ पास नहीं हुई हैं, ये अपने समाज के लिए प्रेरणा की लौ बनकर जली हैं।” अब वे बिरहोर समाज की अगली पीढ़ी की ‘रोल मॉडल’ बन गई हैं।
कौन हैं बिरहोर?
बिरहोर, एक ऐसा समुदाय जो सदियों से जंगलों में भटका, लकड़ियां काटी, और शिकार करके पेट पाला। PVTG (Particularly Vulnerable Tribal Group) में दर्ज इस जनजाति के लोग आज भी मुख्यधारा से दूर हैं। लेकिन अब किरण और चानवा ने दिखा दिया है कि “भूख के बीच भी उम्मीद पल सकती है, और अज्ञानता की जड़ों में भी शिक्षा का बीज बोया जा सकता है।” इधर, जमुनियातरी गांव अब मिसाल बन गया है। जहां पहले सिर्फ लकड़ी और जंगल की बातें होती थीं, आज वहां किताबों की बात हो रही है। और वहां की बेटियां – देश और समाज के नाम कर रही हैं अपनी मेहनत और सपना।












