Ranchi : रांची के सरकारी विद्यालयों में आज जो नज़ारा था, वह सिर्फ एक वार्षिकोत्सव नहीं, बल्कि सपनों के पंख खोलने का उत्सव था। रंगबिरंगे परिधानों में सजे-धजे बच्चे लोकनृत्य की थाप पर खूब थिरके, कच्ची उम्र की मासूम आवाजें मंच से गूंज रही थीं। यह कोई स्कूल का कार्यक्रम नहीं, बल्कि एक भव्य महोत्सव सा नजारा लगा। रांची के DC मंजूनाथ भजन्त्री का एक ही सपना है—”कोई भी बच्चा सिर्फ पढ़ाई तक सीमित न रहे, बल्कि उसके व्यक्तित्व का संपूर्ण विकास हो।” और इस वार्षिकोत्सव ने उस सपने को हकीकत में बदल दिया।
गांव की गलियों से मंच तक—हर प्रतिभा को मिला नया आसमान
जिले के 2000 सरकारी विद्यालयों में पढ़ने वाले 1.5 लाख से भी ज्यादा बच्चों ने जब अपने हुनर की दुनिया खोली, तो हर आंख गर्व से चमक उठी। झारखंड की कला, संस्कृति और लोकगीतों की मिठास जब इन बच्चों की मासूम प्रस्तुतियों में घुली, तो लगा जैसे परंपरा और आधुनिकता का संगम हो गया हो। नन्हे कलाकारों की तोतली ज़ुबान से निकले संवाद जब सामाजिक कुरीतियों पर चोट कर रहे थे, तब वहां मौजूद हर व्यक्ति के दिल में उम्मीद की एक नई किरण जाग उठी।
जब ‘रांची स्पीक्स’ में गूंजा आत्मविश्वास
जिला शिक्षा अधीक्षक बादल राज ने जब औपचारिक रूप से मध्य विद्यालय, जगन्नाथपुर में वार्षिकोत्सव की शुरुआत की, तो माहौल संजीदा हो गया। ‘रांची स्पीक्स’ नामक भाषण प्रतियोगिता में जब नन्हे वक्ताओं ने आत्मविश्वास से भरी आवाज़ में अपनी बात रखी, तो वहां मौजूद हर किसी को यह अहसास हुआ कि ये बच्चे केवल किताबी ज्ञान के नहीं, बल्कि एक मजबूत और सुनहरे भविष्य के प्रहरी हैं।
शिक्षकों और अभिभावकों के चेहरे पर मुस्कान
शिक्षक बच्चों के जलवा को देख गर्व से अभिभूत थे, वहीं उनके माता-पिता की आंखों में एक अलग ही चमक थी। वे जिन्होंने कभी सोचा भी नहीं था कि उनके बच्चे इस तरह मंच पर खड़े होकर परफॉर्म करेंगे, आज तालियों की गूंज के साथ उनके सपनों को भी उड़ान मिल गई। इस उत्सव में झारखंड के पारंपरिक लोकनृत्य से लेकर देशभक्ति गीतों तक की झलक देखने को मिली। बच्चे झारखंडी संस्कृति की अमिट छाप छोड़ गये। वहीं, सामाजिक कुरीतियों पर आधारित नाटकों ने सबको सोचने पर मजबूर कर दिया।














