आसमान में बढ़ता कचरा खतरे की घंटी, उड़ानों पर ब्रेक की चिंता…

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Kohramlive : जैसे शहरों की सड़कों पर ट्रैफिक बढ़ता है, वैसे ही अब आसमान भी ‘भीड़’ से जूझ रहा है। फर्क बस इतना है कि यहां गाड़ियां नहीं, बल्कि टूटे सैटेलाइट और रॉकेट के टुकड़े दौड़ रहे हैं। यही ‘स्पेस जंक’ अब विज्ञान जगत की धड़कनें तेज कर रहा है और उड़ानों की रफ्तार पर भी ब्रेक लगा रहा है। स्पेस रिपोर्ट्स के मुताबिक, धरती की कक्षा में करीब 15,800 टन अंतरिक्ष मलबा 14.12 करोड़ छोटे-बड़े टुकड़ों में तैर रहा है। ये टुकड़े कभी भी खतरा बन सकते हैं, किसी सैटेलाइट के लिये भी और आसमान में उड़ते विमान के लिये भी।

क्या है यह ‘आसमान का कचरा’?

निष्क्रिय सैटेलाइट, पुराने रॉकेट के हिस्से और सूक्ष्म उल्कापिंड, लो-अर्थ ऑर्बिट (LEO) में तेजी से बढ़ रहा मलबा, पेंट के छोटे कण से लेकर बस जितनी बड़ी निष्क्रिय मशीनें तक शामिल है। एक तरह से देखें तो यह अंतरिक्ष की ‘भूली-बिसरी मशीनों’ का कब्रिस्तान बनता जा रहा है, जो अब खतरनाक मोड़ ले रहा है।

जब-जब अंतरिक्ष ने दी चेतावनी

• 2007: चीन के एंटी-सैटेलाइट परीक्षण से 3,000 से ज्यादा मलबे के टुकड़े
• 2009: रूसी और अमेरिकी सैटेलाइट की टक्कर से 2,000 से ज्यादा टुकड़े
• 2021: रूसी मिसाइल परीक्षण से 1,500 से ज्यादा मलबा, ISS में अलर्ट
• 2008: अमेरिका ने अपना जासूसी सैटेलाइट गिराया, मलबा बिखरा

हर घटना ने आसमान में ‘अदृश्य खतरे’ को और घना कर दिया।

फ्लाइट पर भी पड़ रहा असर

• कई बार सैकड़ों उड़ानें डिले या डायवर्ट
• स्पेन-फ्रांस ने 20 टन रॉकेट के री-एंट्री पर एयरस्पेस बंद किया
• 645 उड़ानों में देरी, कुछ का रूट बदलना पड़ा
• 2025 में रॉकेट मलबे की चेतावनी पर अंतरराष्ट्रीय उड़ानों के समय बदले

वैज्ञानिकों का कहना है कि मलबे के टुकड़े छोटे जरूर होते हैं, लेकिन इनकी गति गोली से भी कई गुना ज्यादा होती है। यही वजह है कि जोखिम भले कम हो, लेकिन डर बड़ा है।

2030 का खतरा: आसमान होगा और भी भीड़भाड़ वाला

2030 तक 1 लाख से ज्यादा सैटेलाइट लॉन्च होने का अनुमान है। हवाई यात्रियों की संख्या 9.8 अरब से बढ़कर 12 अरब तक पहुंच सकती है। 2042 तक 19.5 अरब यात्रियों का अनुमान है। यानी आसमान में मशीनें भी बढ़ेंगी और इंसानी उड़ानें भी। टकराव का खतरा स्वतः बढ़ जायेगा।

समाधान की राह: ‘जीरो डेब्रिस’ की कोशिश

European Space Agency ने ‘Zero Debris Approach’ अपनाई है, जिसका लक्ष्य 2030 तक पृथ्वी और चंद्रमा की कक्षाओं में मलबा पैदा होने को काफी हद तक सीमित करना है। नये मिशन में मलबे का सुरक्षित निपटान अनिवार्य है। कक्षा में रहने की अवधि 25 साल से घटाकर 5 साल करने की योजना है। विफलता की स्थिति में ऑर्बिट से हटाने की व्यवस्था अनिवार्य है। वैज्ञानिक मानते हैं कि यह समस्या रातों-रात खत्म होने वाली नहीं है। इसमें सालों लगेंगे और अरबों डॉलर खर्च होंगे।

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