Ranchi : दीपावली की रौनक के बाद एक और पावन घड़ी आने वाली है, देवउठनी एकादशी, जिसे प्रबोधिनी एकादशी भी कहा जाता है। यह वह दिन है जब भगवान विष्णु चार महीने की योगनिद्रा से जागते हैं, और ब्रह्मांड में फिर से शुभ कार्यों का आरंभ होता है। हर साल की तरह इस बार भी भक्तों में उल्लास और आस्था का संगम देखने को मिलेगा। मंदिरों में घंटों की गूंज होगी, आरती के सुरों में भक्ति बह निकलेगी और तुलसी-विवाह की रस्में वातावरण को दिव्यता से भर देंगी। इस वर्ष यह 1-2 नवंबर 2025 को मनाई जायेगी। एकादशी तिथि सुबह 9.11 बजे से शुरू होकर 2 नवंबर को सुबह 7.30 बजे तक रहेगी। व्रत पारण (उपवास तोड़ने का शुभ समय) 2 नवंबर दोपहर 1.11 बजे से 3.23 बजे के बीच रहेगा।
कहते हैं कि आषाढ़ शुक्ल एकादशी को भगवान विष्णु क्षीरसागर में योगनिद्रा में चले जाते हैं, इसे देवशयनी एकादशी कहा जाता है। चार महीने बाद, कार्तिक शुक्ल एकादशी को वे जागते हैं। इसीलिए इसे “देवउठनी” या “देव जागरण” कहा गया है। इस दिन से विवाह, गृह प्रवेश, यज्ञ, मुंडन जैसे सभी शुभ कार्यों की शुरुआत पुनः होती है। भक्त भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की पूजा करते हैं, शंख, घंटी और आरती से उन्हें “जगाया” जाता है, और वातावरण “हरि नाम” से गूंज उठता है। देवउठनी एकादशी का सबसे मनोहर दृश्य होता है, तुलसी विवाह। इस दिन तुलसी (मां लक्ष्मी का प्रतीक) और शालिग्राम (भगवान विष्णु का प्रतीक) का विवाह रचाया जाता है। गांवों और शहरों में महिलायें मंगल गीत गाती हैं, “शुभ दिन आयो, तुलसी ब्याही शालिग्राम संग, कहा जाता है, इससे घर-परिवार में सुख, शांति और समृद्धि आती है।












