Garhwa(Nityanand Dubey) : शारदीय नवरात्रि के अवसर पर गायत्री शक्तिपीठ कल्याणपुर में आयोजित श्रीराम कथा के आठवें दिन विनोद पाठक ने बताया कि प्रभु श्रीराम का वनवास केवल माता कैकई या दासी मंथरा के कारण नहीं हुआ। यह देवताओं की योजना और सरस्वती माता की बुद्धि का परिणाम था। रामचरित मानस के एक दोहे का हवाला देते हुये विनोद पाठक ने कहा कि “बिपति हमारी बिलोकि बड़ि मातु करिअ सो आजु, रामु जाहिं बन राजु तजि होई सकल सुर काजु।” देवताओं ने चाहा कि यदि श्रीराम सीधे अयोध्या की गद्दी पर बैठेंगे तो उनके अवतार का उद्देश्य, रावण सहित सभी असुरों का संहार पूरा नहीं हो पायेगा। इसलिये राज्याभिषेक को रोकना और वनवास करवाना देव कार्य था।
वन गमन: त्याग और स्नेह का आदर्श
सोमवार शाम को श्रीराम के वन गमन से प्रयागराज और चित्रकूट तक की यात्रा की कथा सुनाई गई। श्रीराम ने पिता के वचन का पालन करते हुये, अयोध्या के विशाल राज्य को त्याग कर वनवास स्वीकार किया। उनके साथ सीता माता और छोटे भाई लक्ष्मण भी स्वेच्छा से वन में गये। विनोद पाठक ने जोर दिया कि यह प्रसंग हमें सिखाता है कि परिवार की नींव सदस्यों के त्याग, स्नेह और समर्पण पर टिकी होती है। उन्होंने खेद व्यक्त किया कि आधुनिक परिवारों में यह आदर्श धीरे-धीरे खोता जा रहा है। शिवपूजन व्यास ने भजन प्रस्तुत किये। सह गायक उपेंद्र शर्मा, बैंजों पर रंजीत विश्वकर्मा, नाल पर राम सुंदर राम, और झाल पर नंदू ठाकुर व अशोक विश्वकर्मा ने संगत दी। कथा का संचालन अखिलेश कुशवाहा ने किया और ट्रस्टी मिथिलेश कुशवाहा द्वारा लाइव प्रसारण किया गया।






