अंधेरी रात और लोकतंत्र की घायल आत्मा

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Garhwa(Nityanand Dubey) : रेजो गांव की वो रात… जब मंगल गीतों की गूंज में अचानक गोलियों की गड़गड़ाहट घुल गई। शादी की रौशनी में सजी उस चौपाल में जब चीखें गूंजीं, तब लोकतंत्र का दिल कांप उठा। भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता और गढ़वा के विधायक सत्येंद्र नाथ तिवारी की आंखों में आक्रोश और चिंता दोनों साफ झलक रहे थे, जब उन्होंने कहा, “रेजों की रात, प्रशासन की उस लापरवाही की कहानी है, जो अब लहू से लिखी जा रही है।” उन्होंने प्रशासन पर सीधा इल्जाम लगाया, “गढ़वा में हथियारों के लाइसेंस, जैसे रेवड़ियों की तरह बांटे गये। न अपराध की जांच, न पात्रता की जांच। नतीजा ये कि अब शादियों में भी लाइसेंसी हथियार अपराध की भाषा बोल रहे हैं।”

वो रात, जब पत्रकार रमाशंकर चौबे के आंगन में उत्सव था, और अचानक कुछ सामंती सोच के लोग वहां गोलियां बरसाने लगे। विधायक तिवारी का सवाल साफ था, “क्यों नहीं लिया प्रशासन ने पहले चेतावनी को गंभीरता से? क्यों आम जन को छोड़ दिया गया अपराधियों के रहमोकरम पर?” उन्होंने चेताया, “अगर अब भी दोषियों पर सख्त कार्रवाई नहीं हुई, अगर घायलों की चिकित्सा व्यवस्था सार्वजनिक नहीं की गई। तो भाजपा सड़कों पर उतरेगी। यह सिर्फ राजनीति नहीं, आमजन की सुरक्षा का सवाल है।” रेजो की घटना ने सिर्फ गोलियां नहीं बरसाईं, उसने भरोसे के शीशमहल में दरार डाल दी है। अब गढ़वा इंतज़ार कर रहा है— एक जवाबदेह प्रशासन का, एक न्यायप्रिय व्यवस्था का, और उस विधायक की आवाज़ का, जो हर बार पीड़ितों के साथ खड़ा दिखा है।

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