Garhwa(Nityanand Dubey) : रविवार की वह रात, जब गांव के आसमान पर चांद उदास था और हवा में कुछ अनकहा सिसक रहा था। गढ़वा के चिनिया थाना क्षेत्र के चिरका ग्राम में मौत छिपकर नहीं, खुले आम चिंघारती हुई आई। करीब रात के 9 बजे, जब अधिकतर घरों के चूल्हे ठंडे हो चुके थे, तभी गांव के बाहर के रास्ते पर दो जिंदगियां अपनी नियति से बेखबर थीं, 35 साल की प्रमिला देवी, जो अपने पति किशुन भुइयां के घर की आत्मा थीं, और 30 साल के सुधीर सोरेन, जो पूरे गांव में अपने सहज स्वभाव के लिए जाने जाते थे। शायद किसी जरूरी काम से दोनों गांव की सीमा पार कर गये थे, लेकिन उन्हें क्या पता था कि वहां मौत घात लगाए बैठी है, जंगली हाथी के रूप में।
हाथी ने कोई चेतावनी नहीं दी, कोई आवाज नहीं की, बस… एक पल में सब कुछ कुचल कर रख दिया। प्रमिला और सुधीर के शरीर माटी में मिल गये, लेकिन उनके जाने से जो सन्नाटा गांव पर छाया, वह हर घर की दीवारों से टकराकर लौट रहा है। गांव अब सहमा हुआ है। मातम हर आंगन में बिखरा है। लोग सिर्फ दुखी नहीं हैं, वे नाराज हैं और यह नाराजगी है वन विभाग की उस चुप्पी से, जो घटना के घंटों बाद भी नहीं टूटी। न कोई अधिकारी आया, न कोई सुरक्षात्मक पहल। बीते कुछ रोज में हाथियों का आतंक बढ़ा है, लेकिन न कोई चेतावनी आई, न कोई सुरक्षा दीवार खड़ी हुई। ऐसा लगता है जैसे वन विभाग ने आंखें मूंद ली हैं और जवाबदेही को जंगल में कहीं गुम कर दिया है। ग्रामीणों की मांग है कि मृतकों के परिजनों को न सिर्फ मुआवजा मिले, बल्कि ऐसे हादसे फिर न हों, इसके लिए पुख्ता इंतजाम किये जायें।






