Kohramlive : तारीखें बदलती रहीं, लेकिन ताज वही रहा। शान, मोहब्बत और याद की निशानी। मगर इस बार, मोहब्बत के गवाह ने मौत की दो दर्दनाक कहानियां देखीं। तापमान 40 डिग्री के पार था। धूप, जैसे अंगारे गिरा रही हो। लू की लहरों में वो आया था, महाराष्ट्र से नोबादे रमेश गुणवंतराव, शायद सोचा होगा, “ताजमहल देखूंगा, प्रेम की कहानी को महसूस करूंगा।” लेकिन ताजमहल के रॉयल गेट पर ही जिंदगी ने साथ छोड़ दिया। वो अचानक गिर पड़ा, किसी ने दौड़कर पानी दिया, किसी ने एंबुलेंस को फोन किया, मगर गर्मी ने पहले ही अपना काम कर लिया था। अस्पताल पहुंचते ही डॉक्टर ने सिर झुका लिया और उनके मुख से हौले से केवल इतना निकला सांरी।
अगले ही दिन, चारधाम यात्रा से लौटा एक और जत्था, कर्नाटक के 63 वर्षीय अप्पाशी बागलकोट, जो समूह के लिये बावर्ची थे। ताजमहल की चमक देखने सब अंदर चले गये, लेकिन अप्पाशी वहीं रह गये, शिल्पग्राम की एक छांव में, गाड़ी की सीट पर बैठकर। सीने में दर्द था, पर वो बोले नहीं, शायद सोचा होगा, “थोड़ी देर में सब आ जायेंगे।” लेकिन दोपहर 3 बजे, शरीर ने जवाब दे दिया। अस्पताल तक तो गये, मगर वहां सिर्फ मौन था। कभी शाहजहां ने मुमताज की याद में इसे बनवाया था, जहां हर पत्थर मोहब्बत की जुबां बोलता है। वहीं दो जानें गईं, गर्मी के इस कहर ने सबको झकझोर दिया।
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