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मां जेल में है तो क्या हुआ, बच्चे का बचपन कैद नहीं होगा… जानें कैसे

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Ranchi : अपराध की दुनिया से किसी बच्चे का क्या वास्ता? उसने न कोई गुनाह किया, न किसी का हक छीना। फिर उसकी आंखों में जेल की सलाखों की परछाईं क्यों हो? झारखंड की जेलों में रहने वाली महिला बंदियों के मासूम बच्चों की जिंदगी में यही सवाल अब एक नई पहल का जवाब बन रहा है। मां जेल में है, लेकिन बच्चे का बचपन जेल जैसा नहीं होगा। इसी सोच के साथ जेल प्रशासन ने महिला बंदियों के बच्चों के लिये ‘गोल्डन चाइल्ड’ पहल शुरू की है। फिलहाल इसकी शुरुआत बिरसा मुंडा केंद्रीय कारागार, होटवार, रांची से की गई है। मकसद है कि जेल में रहने वाले बच्चे खुद को बाकी समाज से अलग न समझें और शिक्षा, खेल, रचनात्मकता व खुशियों के बीच अपना बचपन जी सकें। जेल IG सुदर्शन मंडल के हवाले से मीडिया में आई खबर के मुताबिक, ‘गोल्डन चाइल्ड’ के तहत विशेष क्रेच/चाइल्ड केयर सेंटर विकसित किया गया है। इस पहल की सबसे खूबसूरत बात यह है कि यहां सिर्फ महिला बंदियों के बच्चे ही नहीं, बल्कि कारा विभाग के कर्मचारियों के बच्चे भी साथ रहेंगे, पढ़ेंगे और खेलेंगे। सोच यही है कि किसी बच्चे के मन में यह सवाल न उठे कि वह बाकी बच्चों से अलग है। जहां एक बच्चा जेल की पहचान लेकर जी सकता था, वहां अब कोशिश है कि उसे दोस्त मिलें, खेल मिले, किताबें मिलें और सपनों के लिये खुला आसमान मिले। कानून के प्रावधानों के तहत छह साल तक की उम्र के बच्चे अपनी मां के साथ जेल में रह सकते हैं। यही वजह है कि कई मासूमों का बचपन जेल की चहारदीवारी में बीत रहा है। कुछ बच्चों ने तो दुनिया में आंखें भी जेल परिसर में ही खोली हैं। लेकिन जेल प्रशासन अब उनकी देखभाल को केवल भोजन और स्वास्थ्य तक सीमित नहीं रखना चाहता। कोशिश है कि बच्चा जेल में रहते हुये भी पढ़े, खेले, जन्मदिन मनाये, दूसरे बच्चों से घुले-मिले, अपनी प्रतिभा पहचाने, और सबसे जरूरी, अपने सपनों को जिंदा रखे। जेल प्रशासन का कहना है कि बच्चों के जन्मदिन भी मनाये जाते हैं। पढ़ाई के साथ खेलकूद और मनोरंजन की व्यवस्था पर भी जोर दिया जाता है। आखिर बच्चे का मन सिर्फ किताबों से नहीं खिलता। कभी गेंद के पीछे भागना, कभी रंगों से कागज भर देना और कभी दोस्तों के साथ खिलखिलाकर हंसना भी उसके विकास का हिस्सा है। यही छोटी-छोटी खुशियां इन बच्चों को यह एहसास दिलाने की कोशिश हैं कि उनका बचपन किसी दूसरे बच्चे से कम नहीं है।

रंगों से भरेंगे सलाखों के बीच के दिन

छह साल तक की उम्र के बच्चों के लिये क्रेच में उनकी उम्र के हिसाब से खेल और पढ़ाई की सुविधाएं उपलब्ध कराई जा रही हैं। रंग-पेंटिंग से लेकर छोटे साइकिल और खेल सामग्री तक, बच्चों के लिये कई संसाधन रखे गये हैं। पढ़ाई के लिये बेंच-डेस्क और जरूरी शैक्षणिक सामग्री भी उपलब्ध कराई जा रही है। यहां बच्चों को सिर्फ किताबों के पन्नों से नहीं, बल्कि खेल और रचनात्मक गतिविधियों के जरिए सीखने का अवसर मिलेगा। क्योंकि बचपन आखिर बचपन है, उसे सिर्फ अनुशासन नहीं, शरारत भी चाहिये, सिर्फ किताब नहीं, रंग भी चाहिये और सिर्फ चारदीवारी नहीं, दोस्त भी चाहिये।

जन्म से ही मां और बच्चे की खास देखभाल

जेल में गर्भवती महिला बंदियों के स्वास्थ्य को लेकर भी विशेष व्यवस्था की गई है। जेल IG के अनुसार, गर्भावस्था के दौरान विशेषज्ञों की सलाह के मुताबिक विशेष डाइट दी जाती है। बच्चे के जन्म के बाद नवजात के स्वास्थ्य और पोषण पर भी ध्यान दिया जाता है। नये जेल मैनुअल के प्रावधानों के तहत गर्भवती महिलाओं और बच्चों के लिये डायटीशियन और मेडिकल बोर्ड की सिफारिश के आधार पर विशेष आहार उपलब्ध कराया जा रहा है। यानी कोशिश सिर्फ यह नहीं कि बच्चा जेल में सुरक्षित रहे, बल्कि यह भी कि उसका शारीरिक और मानसिक विकास सही दिशा में हो। इस पूरी पहल के पीछे सबसे बड़ी चिंता बच्चे के भविष्य की है। अपराध अगर मां का अतीत है, तो उसे बच्चे का भविष्य नहीं बनने दिया जा सकता। जेल की सलाखों के बीच रहने वाला बच्चा किसी अपराध का आरोपी नहीं है। इसीलिये कोशिश है कि छह साल की उम्र के बाद जब बच्चा जेल की चहारदीवारी से बाहर निकले तो उसके साथ केवल जेल की यादें न हों। उसके पास हो, पढ़ाई की नींव, अच्छे संस्कार, आत्मविश्वास और आगे बढ़ने का सपना। जेल प्रशासन की कोशिश यही है कि मां का अतीत बच्चे की पहचान न बने।

झारखंड की जेलों में 631 महिला बंदी

जेल विभाग की रिपोर्ट के अनुसार, झारखंड की विभिन्न जेलों में कुल 16,421 बंदी हैं। इनमें 631 महिलाएं हैं। इनमें 484 महिला विचाराधीन बंदी हैं, जबकि 147 महिलाएं सजायाफ्ता हैं। यानी महिला बंदियों की बड़ी संख्या ऐसी है, जिनके मामलों में अभी अदालत का अंतिम फैसला नहीं आया है। महिला बंदियों के लिये राज्य की जेलों में कुल 946 बेड/बंदी क्षमता निर्धारित है। मौजूदा आंकड़ों के अनुसार करीब 66.7 प्रतिशत क्षमता का इस्तेमाल हो रहा है। महिला बंदियों की संख्या अलग-अलग जेलों में अलग है। बिरसा मुंडा केंद्रीय कारा, होटवार, रांची में सबसे अधिक 113 महिला बंदी हैं। इनमें 19 सजायाफ्ता और 94 विचाराधीन हैं। इसके बाद एलएन नारायण केंद्रीय कारा, हजारीबाग में 66 महिला बंदी हैं। इनमें 40 सजायाफ्ता और 26 विचाराधीन हैं। वहीं घाघीडीह जेल, जमशेदपुर में 63, दुमका जेल में 55 और मेदिनीनगर केंद्रीय कारा में भी 55 महिला बंदी हैं।

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