Ranchi : कभी-कभी इंसान की तकदीर किसी और की आंखों से लिखी जाती है। स्नेहलता की जिंदगी इसका जीता-जागता प्रमाण है। किसी अनजाने का नेत्रदान, एक बच्ची की मुस्कान, एक युवती की शादी और एक औरत की पूरी जिंदगी का उजाला बन गया। यह कहानी सिर्फ चिकित्सा की नहीं, यह कहानी है, अंधेरे को हराकर उजाला गले लगाने की। रांची की मिट्टी ने एक बार फिर यह साबित किया कि इंसान का असली सौंदर्य उसकी आंखों की रौशनी और दिल की कृतज्ञता में बसता है।
अंधकार से उजाले तक
28 साल पहले, एक मासूम बच्ची, उम्र बस 10 साल। पढ़ाई की ललक इतनी कि ट्यूबलाइट की तेज रोशनी में देर रात तक किताबों में डूबी रहती। तभी अचानक उसकी आंख में एक छोटा-सा कीड़ा चला गया। मासूमियत में उसने अपनी आंख को जोर से मसल दिया और ज़िंदगी अंधेरे की तरफ बढ़ने लगी। धीरे-धीरे आंख लाल हुई, फिर कॉर्निया (आंख का काला हिस्सा) सफेद पड़ गया। स्नेहलता ने कई डॉक्टरों के चक्कर लगाये, लेकिन सफेदी जाने का नाम नहीं ले रही थी। वो दौर 1996 का था। संयुक्त बिहार-झारखंड में पहली बार कश्यप मेमोरियल आई हॉस्पिटल, रांची में डॉ. बी.पी. कश्यप और डॉ. भारती कश्यप ने कॉर्निया प्रत्यारोपण शुरू किया था। मीडिया में इसकी गूंज सुन स्नेहलता छत्तीसगढ़ से रांची पहुंची। डॉ. भारती कश्यप ने पंजीकरण करवाया और कुछ ही महीनों में कॉल आया, “कॉर्निया मिल गया है, आप तुरंत रांची आइये।” सिर्फ 24 घंटे के भीतर प्रत्यारोपण संभव था। जसपुर से रांची की दूरी उन्होंने 3.5 घंटे की जगह 2 घंटे में तय की और हॉस्पिटल पहुंचीं। ऑपरेशन सफल हुआ। स्नेहलता ने पहली बार फिर से साफ दुनिया देखी। उनकी आंखों की सफेदी मिट गई। तस्वीरों में अब खूबसूरती लौट आई। परिवार ने शादी की बात चलाई और कहते हैं ना किस्मत के दरवाजे पर दस्तक मिलते ही खुशियां खुद चलकर आती हैं। लड़के वालों ने देखा और पसंद कर लिया। शादी हुई और वो जयपुर चली गईं। आज, 28 साल बाद भी स्नेहलता भावुक होकर कहती हैं, “जिनकी आंखों से मेरी जिंदगी रौशन हुई, मैं उन्हें सत-सत नमन करती हूं।” जयपुर के डॉक्टर जब भी उनकी आंख की जांच करते हैं, तारीफ किये बिना नहीं रहते
“इतना बेहतरीन कॉर्निया ट्रांसप्लांट, जैसे नई आंखें हों।” सुनें क्या बोली स्नेहलता….














