Kohramlive : ‘सॉरी’ कहना इतना आसान, लेकिन ‘मुझे माफ कर दीजिये’ क्यों भारी पड़ता है? गलती एक ही, माफी के दो शब्द, फिर अंग्रेजी का ‘सॉरी’ दिल पर हल्का और हिंदी की ‘माफी’ इतनी भारी क्यों लगती है? भाषा के पीछे छिपा है भावनाओं और रिश्तों का गहरा मनोविज्ञान। कभी आपने इस छोटी-सी बात पर गौर किया है? गलती हो जाये तो मुंह से तुरंत निकलता है, “सॉरी!” कभी किसी से टकरा गये, किसी की बात काट दी, देर से पहुंचे या किसी का दिल दुखा दिया, बस एक छोटा-सा “सॉरी” और लगता है जैसे बात कुछ हल्की हो गई। लेकिन यही बात हिंदी में कहनी हो तो अचानक शब्द भारी लगने लगते हैं, “मुझे माफ कर दीजिये…” वाक्य छोटा है, मगर उसके साथ जैसे मन का कोई दरवाजा खुल जाता है। अपराधबोध, शर्म, जिम्मेदारी और रिश्ते की संवेदनशीलता एक साथ सामने खड़ी हो जाती है। तो आखिर ऐसा क्यों? भाषा सिर्फ शब्द नहीं, हमारी यादों का घर है। हम जिस भाषा में बड़े होते हैं, वह सिर्फ बोलने का माध्यम नहीं होती। उसमें हमारा बचपन बसा होता है। मां की डांट, पिता की सीख, दोस्तों की शरारत, स्कूल की सीख, घर के संस्कार और रिश्तों की गर्माहट, सब कुछ उसी भाषा के शब्दों से जुड़ा होता है। इसीलिये मातृभाषा में बोले गये शब्द कई बार सीधे भावनाओं तक पहुंचते हैं। जब हम कहते हैं, “मैंने गलती की”, तो यह सिर्फ एक सूचना नहीं होती। उसके पीछे अपनी गलती को स्वीकार करने का भाव भी जुड़ जाता है। और जब कहते हैं, “मुझे माफ कर दीजिये”, तो सामने वाले के साथ अपने रिश्ते और अपनी जिम्मेदारी को भी स्वीकार करते हैं।
फिर ‘आई एम सॉरी’ इतना हल्का क्यों लगता है?
दूसरी भाषा का असर यहां थोड़ा अलग हो सकता है। जिस भाषा को हमने स्कूल, कॉलेज या नौकरी के दौरान सीखा हो, उसके शब्दों का हमारे बचपन के अनुभवों से वही गहरा रिश्ता जरूरी नहीं है। इसलिये “I am sorry” बोलते समय कभी-कभी एक हल्की-सी भावनात्मक दूरी महसूस हो सकती है। गलती स्वीकार होती है, माफी भी मांगी जाती है, लेकिन मन पर उसका वजन कुछ कम महसूस हो सकता है। इसे ऐसे समझिये, भाव वही है, लेकिन शब्द तक पहुंचने वाला रास्ता अलग है। मातृभाषा सीधे दिल के पुराने कमरों में दस्तक देती है, जबकि दूसरी भाषा कभी-कभी उसी भावना तक थोड़ा घुमाकर पहुंचती है। लेकिन क्या अंग्रेजी में शर्म कम होती है? जरूरी नहीं यहां कहानी थोड़ी दिलचस्प हो जाती है। ऐसा नहीं है कि दूसरी भाषा में बोलने से इंसान को अपराधबोध या शर्म महसूस ही नहीं होती। शोध में लोगों ने दूसरी भाषा में भी मजबूत नैतिक भावनाएं महसूस की हैं। बल्कि कुछ परिस्थितियों में तस्वीर उलटी भी दिखाई दे सकती है। मसलन, जब सामने वाला व्यक्ति सामाजिक या पेशेवर रूप से ऊंचे पद पर हो, जैसे कोई प्रोफेसर या अधिकारी तो दूसरी भाषा में भी अपराधबोध और शर्म काफी तीव्रता से व्यक्त हो सकती है। यानी मामला सिर्फ ‘सॉरी आसान है, माफी मुश्किल’ का नहीं है। असल खेल इस बात का है कि कौन-सा शब्द हमारे भीतर कौन-सी याद, भावना और सामाजिक जिम्मेदारी जगा देता है। ‘सॉरी’ कभी-कभी भावनात्मक सुरक्षा-कवच बन जाता है। कई बार अंग्रेजी का “सॉरी” गलती स्वीकार करने का आसान रास्ता देता है। हम कहते हैं—“Sorry, मेरी गलती थी।” बात खत्म। लेकिन वही बात हिंदी में कहें, “मुझसे गलती हो गई। मुझे माफ कर दीजिये।” तो शब्दों के साथ जिम्मेदारी भी ज्यादा स्पष्ट होकर सामने आती है।यही वह बारीक फर्क है, जिसे भाषा का मनोविज्ञान समझने की कोशिश करता है। दूसरी भाषा हमें भावनात्मक रूप से थोड़ा पीछे खड़े होकर अपनी बात कहने का मौका दे सकती है।
भाषा सीखना सिर्फ शब्द सीखना नहीं
यही वजह है कि भाषा सीखना केवल शब्दावली और व्याकरण याद करना नहीं है। किसी भाषा को सचमुच सीखने का मतलब यह भी समझना है कि उसमें माफी कैसे मांगी जाती है, सम्मान कैसे जताया जाता है, दुख कैसे व्यक्त किया जाता है और रिश्तों की नजाकत कैसे संभाली जाती है। क्योंकि एक ही भावना अलग-अलग भाषाओं में अलग वजन रख सकती है। किसी भाषा में कोई शब्द बिल्कुल सहज लग सकता है, तो दूसरी भाषा में वही भाव मन को भीतर तक छू सकता है।
आखिर में सवाल ‘सॉरी’ या ‘माफी’ का नहीं…
शायद इसलिये अगली बार जब आपकी जुबान पर अचानक “सॉरी” आये, तो एक पल ठहरकर सोचियेगा। क्या आप सिर्फ एक शब्द बोल रहे हैं, या सचमुच अपनी गलती स्वीकार कर रहे हैं? क्योंकि कभी-कभी “सॉरी” गलती के बीच एक छोटी-सी दूरी बना देता है, जबकि “मुझे माफ कर दीजिये” हमें उसी गलती के सामने खड़ा कर देता है। शायद इसी में भाषा की सबसे खूबसूरत ताकत छिपी है, शब्द केवल बोले नहीं जाते, वे हमारे भीतर कुछ जगाते भी हैं।







