जमशेदपुर : झारखंड के एक और रत्न का निधन। Padmashri से अलंकृत प्रोफेसर दिगंबर हांसदा नहीं रहे। वे लंबे समय से अस्वस्थ चल रहे थे। वे संथाली भाषा के विद्वान थे। उनके निधन की खबर से झारखंड साहित्य जगत में शोक की लहर है।
कई पुस्तकों का संथाली में अनुवाद किया
पूर्वी सिंहभूम जिले के दोवापानी गांव में 16 अक्टूबर 1940 को जन्मे दिगंबर हांसदा का ट्राइबल और उनकी भाषा के उत्थान के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान है। वे केंद्र सरकार के ट्राइबल अनुसंधान संस्थान एवं साहित्य अकादमी के भी सदस्य रहे। उन्होंने सिलेबस की कई पुस्तकों का देवनागरी से संथाली में अनुवाद किया।
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Padmashri पुरस्कार मिला वर्ष 2018 में
वर्ष 2018 में उन्हें साहित्य और शिक्षा के क्षेत्र में उत्कृष्ट योगदान के लिए पद्मश्री सम्मान से नवाजा गया। उन्होंने भारतीय संविधान का भी संथाली भाषा की ओवचिकी लिपि में अनुवाद किया। स्कूल-कॉलेज की पुस्तकों में संथाली भाषा को जुड़वाने का श्रेय प्रोफेसर दिगंबर हांसदा को ही है।
वे लाल बहादुर शास्त्री मेमोरियल कॉलेज के प्राचार्य रहे और कोल्हान विश्वविद्यालय के सिंडिकेट सदस्य भी रहे। उनके निधन के बाद से झारखंड के साहित्य जगत के लोगों ने शोक जताया है और सभी ने उनके निधन को अपूरणीय क्षति बताया है।
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