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एक जलनखोर के कारण बन गया 10 लाख का बड़का उग्रवादी, देखें कैसे

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Ranchi (Rupam) : महाराज प्रमाणिक उर्फ राज यानी आंतक की गाथा लिखने का दूसरा नाम। इसका नाम सुन ही लोग कांप उठते थे। सितमगरों में भी इसके नाम का भय था। मां की जान खतरे में देख बंदूक थामने वाला गांव का सीधा-साधा छउआ देखते ही देखते 10 लाख का इनामी माओवादी बन गया। महाराज प्रमाणिक को लोग बब्लू और अशोक के नाम से भी जाना करते थे। माओवादी महाराज प्रमाणिक का संगठन में बड़ा कद था। केंद्रिय कमेटी के सदस्य कोटेश्वर राव उर्फ किशन जी की मेहरबानी से महाराज प्रमाणिक को सबजोनल कमांडर का तमगा मिला था। बात 2011 की है। संगठन के शीर्ष नेता कोटेश्वर राव को सारंडा से वापस बंगाल लौटना था। तब वह मोस्ट वांटेड हुआ करते थे। किसी भी हालत में उन्हें बंगाल भेजना था। यह जिम्मेदारी संगठन के सबसे वफादार माने जाने वाले अनल, अतुल और अमित को दी गई। पर अनल दा ने सोचा यह महाराज प्रमाणिक की मदद लिये बिना संभव नहीं। 25 दिसंबर 2009 में संगठन से नाता जोड़ने वाले महाराज प्रमाणिक संगठन में अपनी अलग पहचान बना चुका था। संगठन की उम्मीद को प्रमाणिक बखूबी निभा गया और किशन जी को बंगाल तक सही सलामत पहुंचा दिया। इसके बाद अनल दा ने उसे अपने साथ रख लिया और पोड़ाहाट इलाके में ले गये। वहीं पहली बार एक करोड़ के इनामी माओवादी प्रशांत बोस से मिलवाया गया। उसका ज्यातर समय ट्राइजेक्शन इलाके में बीता करता था।

वर्ष 2013 में खूंखार माओवादी कुंदन पाहन संगठन छोड़कर भाग गया। कुंदन पाहन वहीं माओवादी है जिसका नाम ICICI बैंक के पांच करोड़ रुपये नगद और एक किलो से ज्यादा सोना लूटने में उछल कर सामने आया था। वहीं मंत्री रमेश सिंह की हत्या और डीएसपी प्रमोद कुमार सहित पांच पुलिसकर्मी का मर्डर कर कुंदन पाहन मोस्ट वांटेड बन गया था। कुंदन के संगठन छोड़ भाग जाने के बाद महाराज प्रमाणिक को उस इलाके की कमान सौंप दी गई। 2015 में प्रमाणिक को जोनल कमांडर बना दिया गया। प्रमाणिक के जिम्मे संगठन के बड़े माआवादी जैसे किशन दा, विवेक दा, मिसिर बेसरा और कंचन दा का ख्याल रखना था। इन्हें ट्राइजेक्शन क्षेत्र मसलन सारंडा, पोड़ाहाट, बमगाल, गिरिडीह, बोकारो और संताल परगना इलाके में सही सलामत ले जाना और लाना था।

गुजरे 12 साल में महाराज प्रमाणिक ने आंतक की ऐसी गाथा पुलिस फाइल में लिख डाली कि वह एक कालेज स्टूडेंट से खूंखार माओवादी बन गया। उसके खिलाफ झारखंड के खासकर रांची, खूंटी, सरायकेला, ईचागढ़, चौका, चांडिल में कुल 119 नक्सली वारदातें दर्ज हैं। इसमें पुलिस की हत्या और हथियार लूटने से लेकर कई संगीन मामले शामिल हैं। प्रमाणिक की क्रियाविधी से झारखंड पुलिस की नींद हराम हो चुकी थी। तब पुलिस ने उसे जिन्दा या मुर्दा पकड़वाने वाले को 10 लाख रुपये इनाम देने का ऐलान किया। तब भी वह पकड़ में नहीं आया। कई बड़े माओवादियों जैसे अनल उर्फ रमेश दा, बैलुन सरदार, सुरज सरदार उर्फ गाजू, रायमुणी कुमारी उर्फ गीता मुंडा एवं प्रकाश गोप के सरेंडर करने के बाद महाराज प्रमाणिक का भी मन डोलने लगा। उसका मन बदलने में IPS स्तर के तीन बड़े अधिकारियों की भूमिका सराहनीय रही। वहीं महाराज प्रमाणिक नये डीजीपी नीरज सिन्हा, आईजी अभियान अमोल वेणुकांत होमकर और रांची प्रक्षेत्र के आईजी पंकज कंबोज के मिजाज और तेवर को जान चुका था। उसे एक अलग अंजान सा डर हमेशा सताने लगा। परिवार का भी दबाव था कि सरेंडर कर देना ही बेहतर।

एक पुलिस अफसर ने उसके पूरे विचारधारा को बदल डाला। इसी का नतीजा है आज यानी 21 जनवरी को दिन के उजाले में 10 लाख का इनामी माओवादी महाराज प्रमाणिक ने आईजी अभियान अमोल वेणुकांत होमकर और आईजी पंकज कंबोज के सामने हथियार डाल दिया। उस समय मौके पर CRPF के आईजी राजीव कुमार भी मौजूद थे। प्रमाणिक ने एक एके-47, दो मैगजीन, 150 राउंड जिन्दा गोलियां और दो वायरलेस सेट के साथ आत्मसमर्पण किया। सरायकेला खरसांवा के दारूदा गांव के रहने वाले महाराज प्रमाणिक के पिता का नाम जरासिंधू प्रमाणिक है। जेल में रहते हुए बीए तक की पढ़ाई करने वाला प्रमाणिक कुछ अलग करना चाहता था पर जमाने के तथाकथित कुछ ठेकेदारों की करतूतों ने उसे बंदूक थामने को मजबूर कर दिया।

कोहरामलाइव की सीनियर महिला रिपोर्टर रुपम ने सरेंडर के बाद महाराज प्रमाणिक से अगल से बातें की। तब उसने यह राज खोला कि उसने क्यों हथियार थामा। उसने कहा… उसकी मां आंगनबाड़ी में सेविका थी। कुछ जलनखोर उनकी मां से जलते थे। उनकी मां की हत्या करना चाहते थे। तब वह मदद के लिए संगठन के पास गया था। संगठन के सबजोनल कमांडर डेविड महतो ने उसे मार्शल टूटी से मिलवाया। यह लोग मदद करने का भरोसा देकर उसे संगठन में रख लिया। शुरुआत में उसे संगठन का विस्तार और मजबूत करने की जिम्मवारी मिली थी। क्या प्रमाणिक उस जलनखोरों से बदला ले सका या नहीं… सुनें प्रमाणिक की जुबां…

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