कोहराम लाइव डेस्क : किसी महिला के लिए मां बनना जितनी खूबसूरत अनुभूति है, उससे अधिक महत्वपूर्ण बच्चे के लालन-पालन की चिंता और उससे जुड़े सभी दायित्वों के निर्वाह का है। यह ध्यान देने योग्य बात है कि मां को बच्चे की देख रेख की चिंता कभी-कभी इतनी बढ़ जाती है कि यह ओसीडी यानी ऑब्सेसिव कंपल्सिव डिसऑर्डर बन जाती है। इसे मनोग्रसित बाध्यता विकार का नाम दिया जाता है। यह विकार मां के लिए खतरनाक है और इससे बचने का प्रयास हमेशा करना चाहिए।
इसे भी पढ़ें : रेड कलर की ड्रेस में ‘मौनी रॉय’ सोशल मीडिया पर मचा रही धमाल, देखें…
मां बनने वाली प्रत्येक पांच में एक महिला इस रोग से ग्रसित
हाल की एक स्टडी से यह पता चला है कि मां बनने वाली प्रत्येक पांचवीं महिला इस विकार से ग्रस्त होती है। दरअसल नई मां बनने वाली महिलाएं बच्चे को किसी तरह के नुकसान की चिंता में इसकी शिकार हो सकती हैं। शोधकर्ताओं ने सौ महिलाओं पर अध्ययन के आधार पर पाया कि जन्म देने के बाद 38 सप्ताह में 17 प्रतिशत महिलाओं में ओसीडी देखने को मिला।
इसे भी पढ़ें : इमरान को लिखे PM मोदी के खत को महबूबा मुफ्ती ने सराहा, जानें क्या कहा
क्या हैं ओसीडी के प्रमुख लक्षण
मदर्स में डर वाले विचार अत्यधिक घेर लेते हैं। उन्हें डर होता है कि बच्चे को संक्रमण न हो। परिणामस्वरूप वह बार-बार बच्चों की बोतल और कपड़े धोती हैं। नयी मदर्स में करीब आठ प्रतिशत महिलाओं में गर्भावस्था के दौरान कभी न कभी ओसीडी के लक्षण देखे गए। शोधकर्ताओं ने कहा है कि इनके अलावा महिलाओं में बच्चे के जन्म से पहले और गर्भावस्था के दौरान ओसीडी एक अन्य विकार है, लेकिन इसके बारे में कम जानकारी है।
इसे भी पढ़ें :ड्यूटी के दौरान पंपकर्मी की मौत के बाद हंगामा, परिजनों को मिलेगा मुआवजा और पेंशन
पेरेंटिंग, रिश्ते और रोजमर्रा की जिंदगी पर प्रभाव
इस बीमारी का उपचार न होने पर यह पेरेंटिंग, रिश्ते और रोजमर्रा की जिंदगी को प्रभावित कर सकता है। ओसीडी सभी प्रसवकालीन महिलाओं को प्रभावित कर सकता है। यह गर्भावस्था (प्रसवपूर्व) के दौरान और बच्चे के जन्म के बाद (प्रसवोत्तर) दोनों रूप से प्रभावित करता है। निष्कर्षों से पता चला है कि ओसीडी से पीड़ित महिलाओं की अनदेखी न हो और उन्हें सही उपचार की सलाह दी जा सके।
इसे भी पढ़ें :पत्नी ने काट डाला पति का प्राइवेट पार्ट,वजह जान हो जाएंगे हैरान
कुछ महिलाओं में स्वयं ठीक हो जाता है
कुछ महिलाओं में ओसीडी सामान्य तौर पर खुद-ब-खुद ठीक हो जाता है। वह जैसे-जैसे पेरेंटिंग को लेकर अभ्यस्त होती हैं, उनका यह विकार ठीक होने लगता है। कुछ में यह गंभीर हो जाता है और उन्हें उपचार की जरूरत होती है। ऐसी महिलाओं को खास देखभाल की जरूरत होती है। उन पर इस जटिल वक्त में निगरानी रखना जरूरी है, क्योंकि अधिकतर महिलाएं इन लक्षणों की जानकारी नहीं देती हैं।






