Kohramlive : पर्दे पर कभी गुस्से की आग बनकर दहाड़ने वाले, तो कभी खामोशी में जिंदगी का सबसे गहरा दर्द कह जाने वाले अभिनेता नाना पाटेकर का सफर किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं रहा। जिंदगी ने उन्हें बचपन से ही ऐसे किरदार दिये, जिनके संवाद आसान नहीं थे। गरीबी, भूख, परिवार का दर्द और संघर्ष, इन्हीं रास्तों से गुजरते हुये वह हिंदी सिनेमा के उन कलाकारों में शामिल हुये, जिनकी आवाज और अदाकारी आज भी दर्शकों के दिल में उतर जाती है। गोवा के मणिपाल अस्पताल से जुड़ी खबर के मुताबिक, नाना पाटेकर को गुरुवार सुबह करीब 5.20 बजे मृत घोषित किया गया। इससे पहले सीने में गंभीर दर्द की शिकायत के बाद मेडिकल टीम उनके फ्लैट पर पहुंची थी, जहां वह बेहोशी की हालत में मिले। उन्हें कार्डियक मसाज देने के बाद अस्पताल ले जाया गया। मामला मेडिको-लीगल केस होने के कारण पोस्टमार्टम की प्रक्रिया की बात भी सामने आई है। नाना के निधन की खबर के बीच उनके जीवन के वे किस्से भी चर्चा में हैं, जिन्होंने इस अभिनेता को सिर्फ पर्दे का कलाकार नहीं, बल्कि संघर्ष से निकला एक ऐसा इंसान बनाया, जिसकी कहानी कई लोगों को हिम्मत देती रही।
विश्वनाथ से ‘नाना’ बनने की कहानी
नाना पाटेकर का असली नाम विश्वनाथ पाटेकर था। बचपन में उनकी छोटी बहन उन्हें प्यार से ‘नाना’ कहकर बुलाती थीं। घर की इस पुकार ने धीरे-धीरे ऐसी पहचान बनाई कि यही नाम आगे चलकर दुनिया भर में उनकी पहचान बन गया। आज जिस अभिनेता का नाम करोड़ों की फिल्मों से जुड़ा, उसकी जिंदगी का एक दौर ऐसा भी था जब शादी का खर्च सुनकर यकीन करना मुश्किल लगता है। साल 1978 में नाना पाटेकर ने थिएटर कलाकार नीलकांती पाटेकर से शादी की थी। बताया जाता है कि उस समय पूरी शादी में महज 750 रुपये खर्च हुये थे। उस दौर में नीलकांती बैंक में अधिकारी थीं और उनकी मासिक तनख्वाह करीब 2500 रुपये थी। वहीं नाना को एक शो के लिये सिर्फ 50 रुपये मिलते थे।
13 साल की उम्र में हाथों में आया था पेंट का ब्रश
नाना की जिंदगी का संघर्ष बहुत कम उम्र में शुरू हो गया था। परिवार की आर्थिक हालत खराब थी, इसलिये करीब 13 साल की उम्र में उन्होंने काम करना शुरू कर दिया था। स्कूल खत्म होने के बाद वह करीब 8 किलोमीटर पैदल चलकर चुनाभट्टी जाते और फिल्मी पोस्टर रंगते थे। इसके बदले उन्हें महीने के करीब 35 रुपये और दिन में एक वक्त का खाना मिलता था। शायद यही वजह थी कि बाद में जब वह पर्दे पर गरीबी, भूख और बेबसी का किरदार निभाते थे, तो उसमें अभिनय कम और जिंदगी ज्यादा नजर आती थी। नाना ने एक इंटरव्यू में अपने जीवन का बेहद भावुक किस्सा साझा किया था। उनके पिता अस्पताल में भर्ती थे और इलाज के लिये पैसे की जरूरत थी। ऐसे वक्त में उन्होंने नाटक करना जारी रखा। एक तरफ पिता की चिंता थी और दूसरी तरफ मंच पर जाना मजबूरी। जिंदगी ने उन्हें उस उम्र में ही सिखा दिया था कि कभी-कभी इंसान अपने आंसू छिपाकर भी अपना किरदार निभाता है।
‘प्रहार’ के लिये बने असली फौजी
नाना पाटेकर का सेना के प्रति सम्मान जगजाहिर रहा। साल 1991 में आई फिल्म ‘प्रहार: द फाइनल अटैक’ के लिये उन्होंने भारतीय सेना के साथ कड़ा सैन्य प्रशिक्षण लिया था। फिल्म में फौजी की भूमिका निभाने के लिये उन्होंने सिर्फ वर्दी नहीं पहनी, बल्कि सैनिकों की जिंदगी को करीब से समझने की कोशिश की। साल 1999 का कारगिल युद्ध देश के इतिहास का बेहद कठिन दौर था। नाना ने बताया था कि उन्होंने तत्कालीन रक्षा मंत्री जॉर्ज फर्नांडिस से अनुमति लेकर करीब 60 दिन सेना के जवानों के साथ बिताये थे। उन्होंने एक त्वरित प्रतिक्रिया दल के साथ भी समय बिताया था। हालांकि ऑपरेशनल जानकारी साझा करने से उन्होंने इनकार किया था। नाना की फिल्मों के किस्सों में ‘परिंदा’ का क्लाइमैक्स भी बेहद चर्चित रहा। फिल्म के आग वाले दृश्य की शूटिंग असली आग के साथ की गई थी। नाना के मुताबिक, वह वास्तव में आग की चपेट में आ गये थे। उनकी त्वचा के साथ दाढ़ी, मूंछ, भौंह और पलकों तक झुलस गई थीं। उन्हें करीब 60 दिन अस्पताल में रहना पड़ा और लगभग छह महीने आराम करना पड़ा।
बड़े बेटे को खोने का दर्द भी झेला
नाना की निजी जिंदगी में सबसे गहरा दर्द उनके बड़े बेटे के निधन का रहा। बचपन में ही बेटे को खोने का सदमा उन्हें अंदर तक तोड़ गया था। बाद में छोटे बेटे मल्हार पाटेकर के जन्म ने उनकी जिंदगी में फिर खुशियां लौटाईं। मल्हार ने अभिनय के बजाय फिल्म निर्माण और निर्देशन का रास्ता चुना। फिल्मी दुनिया की चकाचौंध से दूर नाना को खेती और खाना बनाने का भी शौक था। पुणे के पास अपने फार्महाउस पर वह खेती करते थे। करीब 10 एकड़ जमीन पर खुद खेत में काम करने और भैंसों की देखभाल करने की बात उन्होंने बताई थी। मजाकिया अंदाज में वह यह भी कहते थे कि शायद वह अभिनेता से बेहतर कुक हैं। नाना पाटेकर की कहानी इसलिए खास है क्योंकि यह सिर्फ एक अभिनेता के स्टार बनने की कहानी नहीं है। यह उस इंसान की कहानी है जिसने भूख देखी, गरीबी देखी, अपनों को खोया, आग की तपिश सही और फिर भी जिंदगी से हार नहीं मानी। शायद यही वजह है कि नाना जब पर्दे पर बोलते थे, तो संवाद सिर्फ कानों तक नहीं पहुंचते थे… सीधे दिल में उतर जाते थे।





