Ormanjhi(Kuldeep/Amitabh) : इस छोटे से स्कूल की दीवारों पर वक्त की मार साफ झलकती है। ईंटें चटक गई, खिड़कियों से हवा नहीं, सन्नाटा झांकता है। उस सन्नाटे के बीच है मास्टरनी सबिता देवी, जिनकी आवाज ही इस वीरान स्कूल की आखिरी उम्मीद है। राजधानी रांची से सटे ओरमांझी प्रखंड में साल 2007 में खुले इस उत्क्रमित प्राथमिक विद्यालय में कभी दो मास्टर थे, लेकिन किस्मत ने एक को दूर कर दिया। साल 2016 के बाद से सबिता देवी ही बच्चों की दुनिया बन गईं। वही पढ़ाती हैं, वही मिड-डे मील बनवाती हैं, और सरकारी रजिस्टर के पन्ने पलटती हैं। केवल आठ बच्चों के लिये ये स्कूल अब किसी कहानी से कम नहीं। एक ही कमरे में बैठकर वो पढ़ते नहीं, डरे-सहमे हालात से जूझते हैं। स्कूल का टॉयलेट अब बस ईंट-पत्थर का ढेर है। झाड़ियां इतनी घनी कि जैसे किसी को बुलावा दे रही हों। बच्चों को वहां जाना तो दूर, पास फटकने से भी डर लगता है। बिच्छू-सांप का डर हर वक्त उनके सिर पर मंडराता है। मजबूरी में वो झाड़ियों या नदी किनारे जाते हैं, और हर बार डर के साये में लिपटे लौटते हैं। स्कूल के चारों तरफ झाड़ियां ऐसे फैली हैं जैसे किसी ने जानबूझ कर लहरायी हो। बारिश में रास्ते इतने खराब हो जाते हैं कि बच्चों का स्कूल आना-जाना भी किसी जंग से कम नहीं लगता। स्कूल की इकलौती मास्टरनी बताती है कि “साल में बस पांच हजार रुपया मिलता है। उसी से रंग-रोगन करो, बाकी काम भी देखो। टॉयलेट की हालत ऊपर वालों को पता है, लेकिन किसी के कान पर जूं तक नहीं रेंगती।” वहीं, प्रखंड शिक्षा प्रसार पदाधिकारी सीमा कुमारी ने कहा, “जल्द ही झाड़ियों की सफाई करवा दी जायेगी और टॉयलेट भी ठीक करवा देंगे।” खामोश पड़े इस स्कूल के बच्चों को इंतजार है कि कोई फरिश्ता आयेगा और उनके अधूरे सपनों को पूरा करेंगे। ये कहानी है हर उस बच्चे की जो किताबों में उजाला ढूंढता है, पर मिलता है बस अंधेरा… वीडियो में देखिये इस सच्चाई को!
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