Ranchi : रांची के मोरहाबादी मौदान में आज आदिवासियों का महाजुटान हुआ। यहां झारखंड के आदिवासी समाज की चिंता, उम्मीद और बेचैनी की बड़ी तस्वीर झलका। सुबह से ही राजधानी की ओर आती सड़कों पर गांवों की मिट्टी की खुशबू लिये लोग पहुंचते रहे। किसी के हाथ में झंडा था, किसी के कंधे पर गमछा और किसी के साथ बच्चे। मौका था आदिवासी एकता महाजुटान का। केंद्र सरकार की ओर से प्रस्तावित परिसीमन के विरोध में पूर्व मंत्री बंधु तिर्की के नेतृत्व में आयोजित इस रैली में झारखंड के अलग-अलग जिलों से करीब एक लाख आदिवासियों के जुटने का दावा किया गया। महाजुटान में महिलाएं थीं, बुजुर्ग थे, युवा थे और बच्चे भी। लेकिन इन चेहरों के पीछे एक ही सवाल बार-बार दिखाई दिया, अगर परिसीमन हुआ तो आदिवासी समाज के राजनीतिक प्रतिनिधित्व का क्या होगा? रविवार को मोरहाबादी मैदान में बार-बार एक नारा सुनाई दिया, ‘अब नहीं तो कभी नहीं।’ यह सिर्फ नारा नहीं था। उसके पीछे दूर गांव से आये उन लोगों की चिंता थी, जिन्होंने रांची तक पहुंचने के लिये चंदा किया। उन मजदूरों की मजबूरी थी, जिन्होंने एक दिन की कमाई छोड़ी। उन महिलाओं की बेचैनी थी, जिन्होंने बच्चों को साथ लेकर मैदान का रास्ता पकड़ा।
चंदा जुटाया, दिहाड़ी छोड़ी, फिर पहुंचे रांची
मोरहाबादी की भीड़ में सियासी चेहरे जरूर थे, लेकिन इस महाजुटान की असली कहानी उन आम लोगों के चेहरों पर लिखी थी, जो दूर-दराज के गांवों से राजधानी पहुंचे। कई बुजुर्ग महिलाओं ने बताया कि रांची आने के लिये उन्होंने आपस में चंदा जुटाया। कुछ लोगों ने कहा कि एक दिन की दिहाड़ी छोड़कर वे यहां पहुंचे हैं। किसी ने रास्ते के लिये खाना बांधा, तो किसी महिला ने घर से ही रोटी-सब्जी रख ली। मैदान में बैठकर महिलाएं रोटी खाती नजर आईं। जैसे कह रही हों, पेट की चिंता अपनी जगह है, लेकिन आने वाली पीढ़ी के हक की चिंता उससे कहीं बड़ी है। महाजुटान में कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष केशव महतो कमलेश, प्रभारी के. राजू, रामेश्वर उरांव, मंत्री शिल्पी नेहा तिर्की, सुबोध कांत सहाय, सुखदेव भगत, विधायक राजेश कच्छप, नमन विक्सल कोंगाड़ी और ऑल इंडिया आदिवासी कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. विक्रांत भूरिया समेत कई नेता मौजूद रहे। मंच से उठी आवाजों का केंद्र एक ही मुद्दा रहा, प्रस्तावित परिसीमन और आदिवासी समाज का राजनीतिक भविष्य। परिसीमन यानी लोकसभा और विधानसभा निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं और सीटों का नये सिरे से निर्धारण। संविधान के अनुच्छेद 82 के तहत जनगणना के बाद संसद कानून बनाकर परिसीमन की प्रक्रिया शुरू कर सकती है। इसके लिये केंद्र सरकार परिसीमन आयोग गठित करती है। आयोग जनसंख्या के साथ-साथ भौगोलिक स्थिति, प्रशासनिक सीमाओं, संचार सुविधा और जनसुविधा जैसे पहलुओं को ध्यान में रखकर निर्वाचन क्षेत्रों का निर्धारण करता है। झारखंड में चिंता खास तौर पर एसटी आरक्षित सीटों को लेकर है। फिलहाल झारखंड विधानसभा की 28 सीटें अनुसूचित जनजाति के लिये आरक्षित हैं, जबकि लोकसभा में 5 सीटें एसटी आरक्षित हैं।
आदिवासी संगठनों को किस बात का डर?
आदिवासी संगठनों का तर्क है कि अगर भविष्य में केवल जनसंख्या के अनुपात को आधार बनाकर निर्वाचन क्षेत्रों का पुनर्गठन किया गया, तो आदिवासी बहुल इलाकों के राजनीतिक प्रतिनिधित्व पर असर पड़ सकता है। उनका कहना है कि झारखंड की तस्वीर केवल आंकड़ों से नहीं समझी जा सकती। यहां की भौगोलिक परिस्थितियां, आदिवासी बहुल इलाकों की विशिष्ट स्थिति, ऐतिहासिक विस्थापन और संवैधानिक संरक्षण भी परिसीमन में महत्वपूर्ण होने चाहिये। महाजुटान से यह संदेश देने की कोशिश हुई कि सीटों की लकीर बदलने का सवाल उनके लिये सिर्फ नक्शे की रेखा नहीं, बल्कि राजनीतिक हिस्सेदारी, पहचान और अधिकार का सवाल है।
अनुच्छेद 342 को लेकर भी उठी आवाज
मंच से यह संदेश भी दिया गया कि अगर संविधान के अनुच्छेद 342 में बदलाव की जरूरत महसूस होती है, तो उसके लिये संविधान संशोधन का रास्ता अपनाया जाना चाहिये। नेताओं ने आरोप लगाया कि कुछ ताकतें झारखंड की राजनीति के आदिवासी केंद्रित स्वरूप को कमजोर करना चाहती हैं। मोरहाबादी की यह भीड़ कह रही थी कि परिसीमन का सवाल अब सिर्फ राजनीतिक दलों की बहस नहीं रहना चाहता। आदिवासी समाज का एक बड़ा वर्ग इसे अपने राजनीतिक प्रतिनिधित्व और आने वाली पीढ़ियों के अधिकार से जोड़कर देख रहा है।
केंद्र ने अप्रैल 2026 में उठाया था विधायी कदम
परिसीमन को लेकर केंद्र सरकार ने अप्रैल 2026 में बड़ा विधायी कदम उठाया था। सरकार ने लोकसभा में तीन संबंधित विधेयक पेश किये, संविधान (131वां संशोधन) विधेयक-2026। परिसीमन विधेयक-2026। केंद्र शासित प्रदेश कानून (संशोधन) विधेयक-2026। प्रस्तावित व्यवस्था में लोकसभा की मौजूदा 543 सीटों को बढ़ाकर करीब 816 करने का मॉडल सामने रखा गया था। सरकार का तर्क है कि इससे सभी राज्यों की सीटें बढ़ेंगी और ‘एक व्यक्ति, एक वोट, एक मूल्य’ के सिद्धांत को मजबूत किया जायेगा। केंद्र की ओर से यह भी कहा गया है कि 2029 तक होने वाले चुनाव मौजूदा सीटों और व्यवस्था के तहत ही होंगे।







