Dumka : अंधविश्वास के मकड़जाल में जकड़े रहने के चलते नतीजा बेहद दर्दनाक आया। दुमका के मसलिया प्रखंड में जहरीले सांप के डंसने के बाद एक महिला की जान इसलिये नहीं बच सकी क्योंकि इलाज की जगह झाड़फूंक को तवज्जों दी गई। मसलिया के जोगीडीह गांव की 42 साल की सावित्री देवी अब इस दुनिया में नहीं हैं। उनके पीछे रोता-बिलखता परिवार है। गांव के कुछ लोगों का कहना है कि अगर समय पर अस्पताल पहुंचा दिया जाता, तो क्या सावित्री आज जिंदा होतीं?
आम के पेड़ की छांव बन गया आखिरी सफर
खबर है कि दोपहर में भोजन करने के बाद सावित्री देवी गर्मी से राहत पाने के लिये घर के पास आम के पेड़ की छांव की ओर जा रही थीं। तभी एक जहरीला सांप, जो किसी चूहे का पीछा कर रहा था, उनके करीब पहुंच गया और उन्हें डंस लिया। शुरुआत में किसी ने खतरे की गंभीरता को नहीं समझा। लेकिन कुछ ही देर में सावित्री देवी की तबीयत बिगड़ने लगी। उन्हें चक्कर आने लगे और फिर वह बेहोश हो गईं। परिजनों और कुछ ग्रामीणों को जैसे ही घटना की जानकारी मिली, घर में अफरा-तफरी मच गई। लेकिन सबसे बड़ी चूक यहीं हो गई। महिला को तुरंत अस्पताल ले जाने के बजाय झाड़फूंक के लिये दुबे बाबा मंदिर पहुंचा दिया गया। उम्मीद थी कि झाड़फूंक से सब ठीक हो जायेगा। घंटों तक पूजा-पाठ और झाड़फूंक का सिलसिला चलता रहा। उधर, महिला की हालत लगातार बिगड़ती चली गई। एक-एक कर करीब 17 घंटे गुजर गये। जब परिजनों को स्थिति की गंभीरता का एहसास हुआ, तब महिला को दुमका के फूलो-झानो मेडिकल कॉलेज अस्पताल ले जाया गया। लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। अस्पताल पहुंचने पर चिकित्सकों ने जांच के बाद सावित्री देवी को मृत घोषित कर दिया। यह सुनते ही परिवार पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा। सावित्री देवी की मौत के बाद पूरे जोगीडीह गांव के लोग दुखी हैं। कुछ लोगों का कहना है कि यदि सांप काटने के तुरंत बाद अस्पताल ले जाया जाता, तो शायद आज नतीजा कुछ और होता।
सांप काटे तो झाड़फूंक नहीं, तुरंत अस्पताल जायें
स्वास्थ्य विशेषज्ञ लगातार कहते रहे हैं कि सांप काटने के बाद हर मिनट कीमती होता है। ऐसे मामलों में झाड़फूंक या घरेलू उपायों पर भरोसा करने के बजाय मरीज को तुरंत नजदीकी स्वास्थ्य केंद्र या अस्पताल पहुंचाना चाहिये, जहां एंटी-स्नेक वेनम जैसी जीवनरक्षक दवाएं उपलब्ध होती हैं।
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