Kohramlive : आमतौर पर देखा जाये तो बच्चा उन्हीं आदतों को सीखता और अपनाता है, जो वह देखता है। खासतौर पर छोटे बच्चे जिन्हें सही-गलत का पता नहीं होता, उनकी गलत आदतों का जिम्मेदार पैरेंट्स को ही माना जाता है। बच्चों की परवरिश उनकी जरूरतों को पूरा करने तक सीमित नहीं होती, बल्कि उनके व्यक्तित्व निर्माण में भी माता-पिता की अहम भूमिका होती है। अच्छी आदतें बच्चे को कामयाबी और खुशहाल जीवन की ओर ले जाती हैं। वहीं, बुरी आदतें मानसिक और शारीरिक विकास को प्रभावित कर सकती हैं। बच्चे वही सीखते हैं, जो वे अपने माता-पिता को करते हुये देखते हैं। इसलिए, पैरेंट्स को अपनी आदतों और बर्ताव पर खास ध्यान देना चाहिये।
यहां कुछ आदतें बताई गई हैं, जिनसे माता-पिता को बचना चाहिये, जैसे…
बार-बार गलत ठहराना
अगर माता-पिता हर छोटी-बड़ी गलती पर बच्चों को डांटते हैं, उनकी तुलना दूसरों से करते हैं या उनकी बातों को महत्व नहीं देते, तो इससे बच्चे का आत्मविश्वास कमजोर हो सकता है। उन्हें अपने विचार व्यक्त करने दें और उनकी बातों को ध्यान से सुनें। छोटी-छोटी कामयाबी पर उनकी तारीफ करें, ताकि उनका आत्म-सम्मान बना रहे।
मोबाइल और स्क्रीन का ज्यादा इस्तेमाल बड़ा दुश्मन
अगर माता-पिता खुद ज्यादा समय तक मोबाइल या टीवी देखते हैं, तो बच्चे भी यही आदत अपना लेते हैं। स्क्रीन पर अधिक समय बिताने से बच्चों की याददाश्त और एकाग्रता पर असर पड़ता है, जिससे उनकी सोचने-समझने की क्षमता कमजोर हो सकती है। इसलिए बच्चों को ज्यादा स्क्रीन टाइम से बचायें और उन्हें आउटडोर एक्टिविटीज में शामिल करें।
अनहेल्दी फूड की आदत डालना
आजकल के फास्ट फूड और फ्रोजन फूड स्वास्थ्य के लिये बेहद हानिकारक हैं। माता-पिता अपने बच्चों को पैक्ड फूड या जंक फूड देते हैं, जो पोषण की कमी पैदा कर सकता है और मानसिक विकास को प्रभावित कर सकता है। बच्चों को हेल्दी और घर का बना खाना खाने की आदत डालें, ताकि वे शारीरिक और मानसिक रूप से मजबूत बनें।
सोने-जागने का कोई शेड्यूल नहीं होना
अगर माता-पिता अपने बच्चों के सोने-जागने की आदतों पर ध्यान नहीं देते, तो उनका स्लीप साइकल बिगड़ सकता है। पर्याप्त नींद न मिलने से बच्चों की याददाश्त कमजोर हो सकती है और उनमें सीखने की क्षमता भी प्रभावित होती है। इसलिए, उनके सोने और जागने का समय निश्चित करें और इस आदत को सख्ती से लागू करें।
बच्चों से खुलकर बातचीत न करना
अगर माता-पिता अपने बच्चों से बातचीत नहीं करते, तो बच्चे धीरे-धीरे खुद को अभिव्यक्त करने से कतराने लगते हैं। इससे उनका आत्मविश्वास कम हो सकता है और वे अपनी समस्याएं माता-पिता से साझा करने से डरने लगते हैं। अपने बच्चों के साथ समय बितायें, उनसे उनकी दिनचर्या के बारे में पूछें और उन्हें अपने मन की बात कहने का मौका दें।












