Kohramlive : एक पुलिस के रसोई में फर्नीचर का काम कर मेहनतनामा मांगना बड़ा गुनाह हो गया। बढ़ई मिस्त्री राजाराम को उसकी पत्नी के सामने पुलिस उठा ले गई। प्रतिरोध करने पर पत्नी को बोला, पूछताछ कर छोड़ दूंगा। उसी रात पौने आठ बजे सुनहरा गांव के जंगल में गोली मारकर राजाराम की हत्या कर दी। बाद में यह झूठी कहानी गढ़ दी कि इनकाउंटर में एक लुटेरा मारा गया। यहां तक कि पुलिस ने उसका अंतिम संस्कार तक कर दिया। बेगुनाह बढ़ई मिस्त्री राजाराम पर एक भी केस नहीं होने पर भी उसे लुटेरा बताया गया। वह पुलिसवालों के घर भी फर्नीचर की मरम्मत का काम करता था। इसके बावजूद उसे लुटेरा बताकर कथित मुठभेड़ में मार डाला। पुलिसवाले उसे पहचानते थे, फिर भी लाश की पहचान नहीं की और लावारिस करार देकर उसका दाह संस्कार कर दिया। उसके घरवाले को उसके मर जाने की सूचना भी नहीं दी। कोर्ट में पुलिस न तो उसे लुटेरा साबित कर सकी और न ही मुठभेड़ को असली। बेगुनाह के खून से सनी खाकी के गुनाहगार पांच पुलिसकर्मियों को उम्रकैद की सजा सुनाई गई, वहीं 38-38 हजार रुपये का जुर्माना भी ठोका गया। इस कांड में दोषी पाये गये चार अन्य पुलिसकर्मियों को 5-5 साल जेल व 11-11 हजार रुपये अर्थदंड की सजा सुनाई गई। इनलोगों पर साक्ष्य मिटाने और झूठी सूचना देने का गुनाहगार पाया गया। एक गुनाहगार पुलिसकर्मी की सुनवाई के दौरान मौत हो चुकी है। यह सजा CBI के विशेष अदालत द्वारा सुनाई गई। इस केस का अनुसंधान CBI कर रही थी। करीब 16 साल पहले यूपी के एटा में यह फेक इनकाउंटर हुई थी।
एक जून 2007 को हाईकोर्ट ने केस दर्ज कर सीबीआई जांच का आदेश दिया। 22 जून 2009 को सीबीआई कोर्ट में आरोप पत्र दाखिल किया गया था। करीब 13 साल तक चली सुनवाई में 202 लोगों की गवाही के बाद साबित हुआ कि सिपाही राजेंद्र ने राजाराम से अपने घर की रसोई में काम कराया था। राजाराम ने मजदूरी के पैसे मांग लिए थे। सिपाही ने मना किया तो राजाराम अड़ गया था। इसी पर सिपाही ने साजिश रच ली। उसे फेक इनकाउंटर में ढेर कर दिया गया। उम्रकैद की सजा पाने वालों में एटा के तत्कालीन थानेदार पवन सिंह, सब-इंस्पेक्टर पाल सिंह ठेनुआ, सरनाम सिंह, राजेंद्र प्रसाद और जीप चालक मोहकम सिंह शामिल हैं। चार पुलिसकर्मी अवधेश रावत, सुमेर सिंह, बलदेव प्रसाद, अजय कुमार को हत्या के आरोप से बरी कर दिया गया, लेकिन साक्ष्य मिटाने और झूठी सूचना देने के मामले में 5 – 5 साल की सजा और 11-11 हजार रुपये का अर्थदण्ड लगाया है।
मीडिया रिपोर्ट के अनुसार सीबीआई के विशेष लोक अभियोजक अनुराग मोदी ने अदालत को बताया कि हाईकोर्ट में दर्ज परिवाद में राजाराम की पत्नी संतोष कुमारी ने इल्जाम लगाया था कि उसके पति राजाराम को एटा जिला के सिढ़पुरा के थानेदार पवन सिंह, पाल सिंह ठेनुवा, अजंट सिंह, सरनाम सिंह और राजेन्द्र प्रसाद ने उठा लिया था। 18 अगस्त 2006 को दोपहर तीन बजे राजाराम अपनी बीमार बहन को देखने जा रहे थे। तब उनके साथ उनकी पत्नी, बड़े भाई शिव प्रकाश एवं छोटा भाई अशोक भी थे। उसने पति को पुलिस से छुड़ाने का प्रयास किया, लेकिन पुलिसकर्मियों ने कहा कि पूछताछ के लिए ले जा रहे हैं, अगले दिन छोड़ देंगे। 28 अगस्त 2006 को थाना सिढ़पुरा की पुलिस ने एक लुटेरे की मुठभेड़ में मौत बताई। उसके शव को अज्ञात में जला देने के बाद बताया कि वह राजाराम था। पत्नी संतोष ने बताया कि वो पहले केस दर्ज कराने के लिए थाने गई तो पुलिस ने उसे भगा दिया। जिला अदालत में प्रार्थना पत्र दिया तो अर्जी खारिज हो गई। इसके बाद वे लोग हाईकोर्ट गये। हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने सीबीआई जांच के आदेश दिये। 2007 में जांच शुरु कर सीबीआई ने 2009 में सिढ़पुरा के तत्कालीन थाना प्रभारी पवन कुमार सिंह सहित दस पुलिसकर्मियों के खिलाफ आरोप पत्र दाखिल किया। सुनवाई के दौरान आरोपी दरोगा अजंट सिंह की मौत हो गई। नौ पुलिसकर्मी हत्या और साक्ष्य मिटाने के दोषी पाये गये।
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