रांची : डॉ भुवनेश्वर अनुज चले गये। ब्रेन हैम्ब्रेज होने के बाद सेवा सदन में इलाजरज थे। आज शाम तीन बजे उनका निधन हो गया। पत्रकार, शिक्षाविद, कई पुस्तकों के लेखक और नागपुरी साहित्य संस्कृति के विराट अध्येता। संजय गांधी मेमोरियल कॉलेज के संस्थापक डॉ अनुज ने रांची सहित गुमला-बसिया के उन क्षेत्रों में महाविद्यालय खोले, जहां शहरी नहीं, गांव के वे बच्चे दाखिला लेते थे, जो शहर के अच्छे कॉलेजों में पढ़ने का सपना भी नहीं देख पाते। अपने महाविद्यालय में कई लोगों को उन्होंने जमीन से उठाकर व्याख्याता, प्रोफेसर और अशैक्षणिक कर्मी बना दिया, लेकिन उनमें से कई को उनके ही खिलाफ खड़ा होते हुए देखा।
उनके खिलाफ षडयंत्र का भी साक्षात्कार किया है। लेकिन डॉ अनुज अपने खिलाफ लोगों की गतिविधियों की जानकारी मिलने पर यही कहते थे कि व्यक्ति से बड़ा संस्थान होता है। जो लोग मेरे सद् व्यवहार का उलटा सिला देते हैं, मैं उन्हें हृदय से माफ कर देता हूं। उन्हें एक दिन जरूर समझ में आयेगा कि उनके जीवन में रोशनी भरने के लिए ईश्वर ने मुझे माध्यम चुना था। शिक्षा के प्रति उनका लगाव तब से देखा है, जब वे मेरे आग्रह पर प्रभात खबर में नब्बे के दशक में नागपुरी साहित्य, संस्कृति और परंपराओं पर सारगर्भित लेख लिखा करते थे। पत्रकारिता जीवन के ढेर सारे अनुभवों में उनका जीवन संघर्ष झलकता था, जब वे हमें अपने जमाने की पत्रकारिता की शुचिता और संघर्ष की कहानियां सुनाया करते थे। जीवन की उपलब्धियों की चर्चा आदमी के जीवित रहते और जाने के बाद होती रहती है, लेकिन डॉ अनुज की चर्चा कई लोग अपने सामने न रहने पर भी करते थे और उनकी जिजीविषा-कर्मठता की मिसालें दिया करते थे। झारखण्ड के समाज में ऐसे लोग धीरे-धीरे कम होते जा रहे हैं। साथ ही कम होती जा रही है व्यक्ति की विराटता और अर्जित बौद्धिकता की विरासत भी, जिससे हम जैसे लोग कुछ और सीख पाते।






