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ललक हो तो जल्‍द मिलेगा कामयाबी का बड़ा फलक

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🎙️कोहराम LIVE रेडियो
  • आंध्रप्रदेश के गुंटुर जिले की चांदना ने 12 लाख के लोन से शुरू की इंसटेंट चपाती व पूड़ी मेकिंग यूनिट
  • 7 लाख सालाना कमा रही कभी दिहाड़ी पर काम करनेवाली महिला
  • 8 महिलाओं को रोजगार देकर संवार रही उनका घर
  • प्रधानमंत्री इम्‍प्‍लॉयमेंट जनरेशन प्रोग्राम (PMEGP) ने दिखाया आगे बढ़ने का रास्‍ता
  • तीन साल के भीतर अपने काम से अन्‍य महिलाओं के लिए प्रेरणा की मिसाल बन गईं चांदना
  • आज केंद्र सरकार भी उनका उदाहरण देकर लोगों को स्‍वरोजगार के लिए कर रही प्रेरित 

कोहराम लाइव डेस्‍क : लगन और ललक हो तो असंभव कुछ भी नहीं। चाह के जज्‍बे से निकल आती है आगे बढ़ने की राह। चाहे जितनी परेशानी और फटेहाली हो, कहीं न कहीं से मदद की सूरत बन जाती है। बेशक नजरिया पॉजिटिव होने पर आज नहीं तो कल कामयाबी का बड़ा फलक मिलना तय है। जी हां, हम बात कर रहे हैं आंघ्रप्रदेश के गुंटुर जिले की पपना मनी चांदना की। दिहाड़ी पर काम करनेवाली महिला ने किस प्रकार अपनी मेहनत और लगन के दम पर लोन के पैसे से न केवल अपनी यूनिट स्‍थापित की, बल्कि तीन साल के भीतर सात लाख सात सालाना कमाने का पुख्‍ता आधार कायम कर लिया। उन्‍होंने स्‍वरोजगार का उदाहरण तो प्रस्‍तुत किया ही, आज के समय में आठ अन्‍य महिलाओं को रोजगार देकर उनका घर भी संवार रही हैं।

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चांदना ने आज के तीन साल पहले पूरी जानकारी हासिल करने के बाद प्रधानमंत्री इम्‍प्‍लॉयमेंट जनरेशन प्रोग्राम (PMEGP) के तहत 12 लाख रुपये का लोन लिया। इसके बाद अपने घर में ही इंसटेंट चपाती व पूड़ी मेकिंग यूनिट शुरू कर दी। आज अपने काम से आसपास की महिलाओं के लिए वह मिसाल बन गई हैं। यह उनकी उपलब्धि के लिए और महत्‍वपूर्ण बात है कि केंद्र सरकार भी उनका उदाहरण देकर लोगों को PMEGP से लोन लेकर स्‍वरोजगार के लिए प्रेरित कर रही है।

लोन के साथ ली ट्रेनिंग 

चांदना ने बताया कि लोन के बारे में पता चला तो तो वह अपने पति पपना नरसिम्‍हाराव के साथ जिला उद्योग केंद्र पहुंची। लोन के लिए आवेदन दिया। कुछ लोगों की सलाह पर इंसटेंट फूड मेकिंग यूनिट के बारे में जाना। उद्योग केंद्र ने पूरी प्रोजेक्‍ट रिपोर्ट बनाने में मदद की। उसे यूनिट चलाने की ट्रेनिंग भी दी गई और फिर 12 लाख रुपये का लोन मिला गया और उसने अपनी यूनिट लगा ली।

पहले साल हुई दिक्‍कत

चांदना कहती हैं कि पहले साल तक कुछ दिक्‍कत हुई। चपातियां बन जाती थीं, पर कस्‍टमर नहीं मिलते थे। कुछ समय बीतने के बाद कस्‍टमर भी मिलने लगे। अब तीन साल बाद सब ठीक हो गया है। यूनिट में काम करनेवाली महिलाओं को वेतन देने और बाकी खर्च निकालने के बाद उन्‍हें 50 से 60 हजार रुपये हर माह बच जाते हैं।

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