Kohramlive(Bhavna Thakur) : क्या नीले ड्रम कांड वाली गुनहगार मुस्कान पहली महिला है जिसे फांसी की सजा सुनायी गयी? आजाद भारत में महिला दोषियों को मृत्युदंड मिलने और उस पर अमल होने की कहानी जानना जरूरी है। नीले ड्रम में पति सौरभ राजपूत को मार उसके शव को छिपाने के सनसनीखेज मामले ने पूरे देश को झकझोर दिया था। अब मुस्कान रस्तोगी और साहिल शुक्ला को मृत्युदंड सुनाये जाने की खबर ने इस मामले को फिर सुर्खियों में ला दिया है। लेकिन इस फैसले के साथ एक अहम सवाल भी उठ रहा है, क्या आजाद भारत में किसी महिला को इससे पहले फांसी की सजा सुनायी गयी थी? और क्या उन महिलाओं को वास्तव में फांसी के तख्ते तक पहुंचाया गया? इसका जवाब है, मुस्कान भारत में मृत्युदंड पाने वाली पहली महिला नहीं हैं। भारतीय न्यायिक इतिहास में ऐसी कई महिलाएं रही हैं, जिन्हें अदालतों ने मौत की सजा सुनायी। हालांकि, सजा सुनाया जाना और वास्तव में फांसी दिया जाना दो अलग बातें हैं।
इतिहास में दर्ज हैं कई नाम
भारत में महिलाओं को मृत्युदंड सुनाये जाने के कई चर्चित मामले रहे हैं। इनमें कुछ ने पूरे देश को झकझोर दिया, तो कुछ मामले लंबे समय तक अदालतों में चले।
1. शबनम: प्रेमी के साथ परिवार के सात लोगों की हत्या का मामला
उत्तर प्रदेश के अमरोहा की शबनम को वर्ष 2008 में अपने परिवार के सात सदस्यों की हत्या के मामले में दोषी ठहराया गया था। उसके साथ सलीम भी इस मामले में दोषी था। दोनों को मृत्युदंड सुनाया गया। शबनम का मामला इसलिये भी चर्चा में रहा, क्योंकि उसकी सजा पर अमल होता तो उसे स्वतंत्र भारत में फांसी पाने वाली पहली महिला बताया जा रहा था। हालांकि, उसे फांसी दिये जाने की पुष्टि नहीं है।
2. रेणुका शिंदे और सीमा गावित: बच्चों की हत्याओं का भयावह मामला
महाराष्ट्र की रेणुका शिंदे और सीमा गावित को बच्चों के अपहरण और हत्याओं से जुड़े मामले में मृत्युदंड सुनाया गया था। सुप्रीम कोर्ट ने भी उनकी सजा बरकरार रखी थी। बाद में वर्ष 2022 में सुप्रीम कोर्ट ने दया याचिका के निस्तारण में अत्यधिक देरी के आधार पर उनकी मृत्युदंड की सजा को आजीवन कारावास में बदल दिया। इन मामलों से साफ है कि महिलाओं को भी गंभीर अपराधों में मृत्युदंड सुनाया गया है, लेकिन अदालतों के फैसले और बाद की कानूनी प्रक्रिया के कारण अंतिम परिणाम अलग-अलग रहे हैं।
क्या आजाद भारत में किसी महिला को सचमुच फांसी दी गयी?
इस सवाल का जवाब देते समय एक ऐतिहासिक पेच समझना जरूरी है। रतन बाई जैन नाम की महिला को वर्ष 1955 में फांसी दिये जाने का उल्लेख कुछ प्रकाशित विवरणों में मिलता है। दूसरी ओर, शबनम के मामले की रिपोर्टिंग में उसे स्वतंत्र भारत में फांसी पाने वाली पहली महिला बताया गया था, यदि उसकी सजा पर अमल होता। इसलिए रतन बाई जैन के मामले का उल्लेख करते समय मूल ऐतिहासिक और जेल रिकॉर्ड से पुष्टि करना जरूरी है। बिना ऐसी पुष्टि के यह दावा करना उचित नहीं होगा कि आजाद भारत में किसी महिला को कभी फांसी नहीं दी गयी या किसी महिला को निश्चित रूप से फांसी दी जा चुकी है।
मुस्कान के मामले में आगे क्या होगा?
मुस्कान रस्तोगी और साहिल शुक्ला को मृत्युदंड सुनाये जाने के बाद भी कानूनी प्रक्रिया के कई चरण शेष हो सकते हैं। भारत में सत्र न्यायालय द्वारा सुनायी गयी मृत्युदंड की सजा को हाईकोर्ट की पुष्टि के बिना लागू नहीं किया जा सकता। इसके बाद परिस्थितियों के अनुसार सुप्रीम कोर्ट में अपील, पुनर्विचार याचिका और दया याचिका जैसे कानूनी विकल्प भी सामने आ सकते हैं। इसलिए मृत्युदंड सुनाया जाना और वास्तव में फांसी दिया जाना एक ही बात नहीं है। अंतिम स्थिति का फैसला न्यायिक प्रक्रिया और संवैधानिक प्रावधानों के तहत होगा।






