Bihar : अनुकंपा नियुक्ति को लेकर पटना हाईकोर्ट ने बुधवार को एक अहम फैसला सुनाया है। कोर्ट ने साफ कहा कि अगर मृत सरकारी कर्मचारी के परिवार में पहले से कोई सदस्य सरकारी नौकरी में है, तो केवल इस आधार पर दूसरे आश्रित को अनुकंपा नियुक्ति नहीं दी जा सकती कि नौकरी करने वाला सदस्य अलग रहता है या आर्थिक मदद नहीं करता। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि अनुकंपा नियुक्ति किसी का कानूनी अधिकार या उत्तराधिकार नहीं है, बल्कि अचानक आये आर्थिक संकट से परिवार को उबारने के लिये दी जाने वाली सीमित राहत है।
कोर्ट ने खारिज की याचिका
यह फैसला पटना हाईकोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस कुमार मनीष की एकलपीठ ने दरभंगा निवासी अजीत कुमार मंडल की याचिका पर सुनाया। मामला उस समय शुरू हुआ, जब याचिकाकर्ता के बड़े भाई, जो कीरतपुर प्रखंड कार्यालय में अनुसेवक के पद पर कार्यरत थे, की वर्ष 2012 में सेवा के दौरान मृत्यु हो गई थी। इसके बाद अजीत कुमार मंडल ने अनुकंपा नियुक्ति के लिये आवेदन किया था। जिला अनुकंपा नियुक्ति समिति ने वर्ष 2016 में उनके आवेदन को यह कहते हुये अस्वीकार कर दिया था कि परिवार का एक अन्य सदस्य पहले से सरकारी सेवा में कार्यरत है। इसके बाद अजीत मंडल ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से कहा गया कि उनका भाई सरकारी नौकरी में होने के बावजूद अलग रहता है और परिवार के खर्च में सहयोग नहीं करता। इसलिये उन्हें अनुकंपा नियुक्ति का लाभ दिया जाना चाहिये। वहीं, राज्य सरकार ने इसका विरोध करते हुये नीरज कुमार मलिक बनाम बिहार राज्य मामले में फुल बेंच के फैसले का हवाला दिया।
कोर्ट ने क्या कहा?
मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, हाईकोर्ट ने कहा कि इस मामले में यह तथ्य स्पष्ट है कि परिवार का एक अन्य सदस्य पहले से सरकारी सेवा में है। कोर्ट ने यह भी माना कि परिवार की बेहद खराब आर्थिक स्थिति साबित करने के लिये कोई ठोस साक्ष्य पेश नहीं किया गया। ऐसे में जिला अनुकंपा नियुक्ति समिति के फैसले में कोई कानूनी त्रुटि नहीं है। सभी तथ्यों को देखते हुये पटना हाईकोर्ट ने अजीत कुमार मंडल की याचिका खारिज कर दी।















