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गोल्ड मेडलिस्ट सूर्या को इंतजार है किसी रहनुमा का…

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  • क्या गजब की रफ्तार थी उस 13 साल के बच्चे की
  • देश के लिए खेलने का जज्बा ऐसा कि छोड़ दी पढ़ाई

रांची : 13 साल के लड़के ने ऐसा खेला कि सब देखते रह गए। उसके खेल को, उसकी रफ्तार को देख सब हैरान। इतनी छोटी सी उम्र में उसने नेपाल, कुवैत और नीदरलैंड में अपने हुनर का ऐसा जलवा दिखाया कि उसके नाम का जलजला आ गया। उसने न स्कूल, न जिला, कभी स्टेट और न नेशनल खेला, सीधे इंटरनेशनल खेलने के लिए भेज दिया गया। यह बच्चा था मोरहाबादी के तेतरटोली का सूर्या तिर्की। पढ़ने में होनहार सूर्या मैट्रिक के इम्तिहान की तैयारी कर रहा था। इसी बीच साउथ एशिया फुटबॉल फेडरेशन के अंडर 16 फुटबॉल टूर्नामेंट के लिए रांची और दिल्ली में ओपन ट्रायल हुआ, 400 बच्चों में सिर्फ सूर्या सेलेक्ट हुआ। इम्तिहान की तारीख भी नजदीक आ गई थी। वह तय नहीं कर पा रहा था कि खेले या पढ़े। उसने सबकी सुनी पर की अपने दिल की और खेलने चला गया नेपाल। वहां मेजबान नेपाल को हराकर टीम ने खिताब अपने नाम किया। सूर्या ने इस चैंपियनशिप में गोल्ड मेडल लाकर राज्य का नाम रोशन किया। इसके बाद कुवैत और नीदरलैंड में भी अपना जलवा बरकरार रखा।

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तबतक पढ़ाई छूट चुकी थी, लेकिन उसे खुशी इस बात की थी कि उसने देश के लिए खेला। सोचा, चलो पढ़ाई छूट गई तो खेल में ही कैरियर बनाया जाए। शुरुआत में खूब सपोर्ट और आश्वासन भी मिला। 2013 में तत्कालीन उप मुख्यमंत्री और वर्तमान मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन से मिला। तब हेमंत ने पीठ थपथपा कर कहा था- अच्छा खेल रहे हो। आगे बढ़ो। सरकार पूरी मदद करेगी। इस मुलाकात के 7 साल बीत गये। आज सूर्या 21 साल का हो चुका है। वो अच्छा फुटबॉल प्लेयर है, लेकिन अब उसके पैरों के नीचे फुटबॉल नहीं है। कंधे पर जिम्मेदारियों का बोझ है। बेरोजगार हो चुका है। पिता की छोटी सी दुकान में बैठकर कुछ पैसे कमाकर घर चला रहा है। वो अब खुद को ठगा महसूस कर रहा है, क्योंकि जिस खेल के लिए उसने अपनी पढ़ाई छोड़ दी, उस खेल से उसे कुछ भी हास‍िल नहीं हुआ।

सूर्या के पिता ने बेटे को एक अच्छा फुटबॉल खिलाड़ी बनाने के लिए उससे कहीं ज्‍यादा अपना खून पसीना बहाया। सरकार ने 40 खिलाड़ियों को सीधी नियुक्ति देने की घोषणा की। उस लिस्ट में सूर्या का नाम नहीं है। परिजनों को उम्मीद है कि शायद दूसरी लिस्ट में सूर्या का नाम आयेगा और उसे एक मौका जरूर मिलेगा।

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