Kohramlive : दिल्ली के नामी-गिरामी अस्पताल के एक कोने में बैठी मां धीरे-धीरे हनुमान चालीसा पढ़ रही थी। उसकी आंखों में उम्मीद की एक आखिरी लौ टिमटिमा रही थी, लेकिन जब उम्मीद की हर राह बंद होती नजर आई, तब माता-पिता ने जिंदगी का सबसे कठिन फैसला लिया। उन्होंने बेटे को इस अंतहीन पीड़ा से मुक्त करने की अनुमति मांगी। इस मामले को समझते हुये सुप्रीम कोर्ट ने निष्क्रिय इच्छामृत्यु की इजाजत दे दी। दिल्ली के All India Institute of Medical Sciences के उपशामक वार्ड में डॉक्टरों की निगरानी में हरीश का इलाज जारी रहा। प्रोटोकॉल के तहत भोजन और पानी बंद कर दिया गया। एक सप्ताह तक जिंदगी धीरे-धीरे बुझती रही और उसी दौरान अस्पताल के एक कोने में बैठी मां लगातार प्रार्थना करती रही। मां की आंखों से आंसू बहते रहे, और होंठों पर बस एक ही वाक्य बार-बार आता रहा, “मेरा बेटा अभी सांस ले रहा है, लेकिन वो मुझे छोड़कर जा रहा है…” आखिरकार एक लंबी खामोशी के बाद हरीश राणा की सांसें थम गईं। बिना किसी शोर-शराबे के, बिना किसी शिकायत के उसने इस दुनिया को अलविदा कह दिया। लेकिन पीछे छोड़ गया एक सवाल, एक पीड़ा और एक ऐसी कहानी, जो सिर्फ खबर नहीं, बल्कि एक मां-बाप की 13 साल लंबी उम्मीद और दर्द की दास्तान बन गई।
सपनों से भरी जिंदगी, एक हादसे में थम गई
गाजियाबाद का रहने वाला हरीश राणा कभी एक होनहार इंजीनियरिंग छात्र था। सपनों से भरी आंखें, भविष्य के कई रंगीन ख्वाब—सब कुछ उसके सामने था। लेकिन साल 2013 में हुये एक हादसे ने उसकी जिंदगी को ऐसे मोड़ पर ला खड़ा किया, जहां से वापसी लगभग नामुमकिन थी। हादसे के बाद हरीश क्वाड्रिप्लेजिया और कोमा की हालत में चला गया। शरीर पूरी तरह जकड़ गया, आवाज भी जैसे कहीं खो गई। वह सांस तो ले रहा था, मगर जिंदगी जैसे बस मशीनों और उम्मीदों के सहारे चल रही थी। मां-बाप ने हार नहीं मानी। उन्होंने हर अस्पताल के दरवाजे खटखटाये, हर इलाज आजमाया, हर मंदिर-मस्जिद में बेटे के लिये दुआ मांगी। दिन महीने बने, महीने साल और देखते ही देखते 13 साल गुजर गये। लेकिन हरीश की आंखें फिर कभी नहीं खुलीं।
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