Kohramlive : कोलकाता के एक अस्पताल में गुरुवार दोपहर, बंगाल की धरती ने अपना एक अमूल्य साहित्यिक रत्न खो दिया, प्रफुल्ल रॉय अब इस दुनिया में नहीं रहे। 91 साल की उम्र में उन्होंने अपनी आखिरी सांस ली, लेकिन उनके लिखे शब्द, उनके उपन्यास, उनकी कहानियां अब भी धड़कती हैं, हर उस पाठक के दिल में, जिसने कभी विस्थापन की पीड़ा पढ़ी, कभी शरणार्थी के आंसू महसूस किये। 1934 में जन्मे प्रफुल्ल रॉय बंटवारे की पीड़ा लेकर भारत आये, और फिर कोलकाता की गलियों में उन्होंने उस दर्द को शब्दों का आकार दिया। ‘केया पातार नौको’ हो या ‘क्रांतिकाल’, हर रचना में झलकता था वह दर्द जो सीमाओं ने पैदा किया, और वह जज्बा जो संघर्षों में पनपा।‘सतो धाराय बॉए जाए’ जैसे उपन्यासों में उन्होंने उन आवाजों को जगह दी जिन्हें अक्सर समाज अनसुना कर देता है। उनकी कहानियां महज साहित्य नहीं थीं, वो दस्तावेज थीं जमाने के। उनकी रचनायें सिर्फ किताबों तक सीमित नहीं रहीं, वे रुपहले पर्दे पर भी जिंदा रहीं, ‘बाघ बहादुर’, ‘आदमी और औरत’, ‘चाराचार’ जैसी फिल्मों ने उनकी कलम के जादू को परदे पर अमर कर दिया। उन्होंने बिहार के गांवों में सालों बिताए, वहाँ के पीड़ितों, दलितों और शोषितों की ज़िंदगी को अपनी कहानियों में उकेरा। उनका साहित्य मिट्टी की महक और पीड़ा की पुकार था। CM ममत बनर्जी ने शोक व्यक्त करते हुये कहा,“प्रफुल्ल रॉय की रचनाएं केवल कथाएं नहीं थीं, वे आम आदमी का इतिहास थीं। उनकी लेखनी ने समाज को एक नया दर्पण दिया।”
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