Garhwa(Nityanand Dubey) : गढ़वा के राजकीय उत्क्रमित मध्य विद्यालय, दलेली के बच्चों के लिये यह दिन खास था। वे स्कूल की चारदीवारी से बाहर निकलकर जीवन की असली पाठशाला में कदम रख रहे थे। झारखंड शिक्षा परियोजना परिषद, रांची के निर्देशानुसार “बस्तारहित दिवस (Bagless Days)” कार्यक्रम के तहत पूर्व व्यावसायिक शिक्षा के तहत इन नन्हे ज्ञानसाधकों के लिये शैक्षणिक भ्रमण का आयोजन किया गया।
छोटे-छोटे कंधों पर बस्ते का बोझ नहीं था, बल्कि मन में जिज्ञासा का भार था। उनकी आंखों में अनगिनत सवाल थे, जो उत्तरों की तलाश में रेलवे स्टेशन, बस स्टैंड, समाहरणालय और बिरसा मुंडा हेलीपैड पार्क तक जा पहुंचे। हर जगह उनके लिये एक नई दुनिया थी—रेलवे स्टेशन पर दौड़ती ट्रेनें, बस स्टैंड पर सफर की तैयारी में लगे लोग, समाहरणालय में कामकाज की गहमागहमी—इन सबने बच्चों को किताबों से बाहर की जिंदगी का पहला पाठ पढ़ाया। शैक्षणिक भ्रमण के दौरान बच्चों को सबसे बड़ी प्रेरणा तब मिली जब वे समाहरणालय पहुंचे और वहां DC शेखर जमुआर से मुलाकात हुई। बच्चों की उत्सुकता देखकर DC मुस्कुराये और उनसे बातचीत की। उन्होंने बच्चों से उनकी पढ़ाई, सपनों और इस भ्रमण से मिली सीख के बारे में पूछा। बच्चों ने भी उत्साह से अपने अनुभव साझा किये। DC ने कहा, “बच्चे ही देश का भविष्य हैं, तुम्हें अपने सपनों को सच करने के लिये मेहनत करनी होगी। जीवन में कठिनाइयां आयेंगी, लेकिन हारना नहीं, संघर्ष ही सफलता की पहली सीढ़ी होती है।”
उनकी बातें सुनकर बच्चों के चेहरे आत्मविश्वास से दमक उठे। यह सिर्फ एक भ्रमण नहीं था, बल्कि उनके लिये एक नई सोच, एक नई दिशा की शुरुआत थी। स्कूल के शिक्षक जगरनाथ राम, जमीला खातून, यूसुफ अंसारी और अन्य उपस्थित शिक्षकों ने भी बच्चों को इस अनुभव से सीखने और आगे बढ़ने की प्रेरणा दी। शिक्षा सिर्फ किताबों में नहीं, बल्कि अनुभवों में भी बसती है। यह शैक्षणिक भ्रमण इसी सोच की एक झलक था—जहां बच्चों ने पढ़ाई को सिर्फ अक्षरों तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उसे ज़िंदगी के हर मोड़ पर महसूस किया। बस्तों से बाहर की दुनिया भी बड़ी रोचक है, बस उसे देखने और सीखने का हुनर चाहिए।










