Garhwa( Nityanand Dubey ): गढ़वा की फिजाओं में एक नई सुगबुगाहट थी। SDO के सभा कक्ष में, जहां आमतौर पर फाइलों की सरसराहट और अफसरों की गंभीर आवाजें गूंजती थीं, आज वहां ढोल, नगाड़ा, मांदर और भांगड़ा की धड़कन सुनाई दे रही थी। SDO संजय कुमार ने अपने साप्ताहिक “कॉफी विद एसडीएम” कार्यक्रम में इस बार उन लोगों को बुलाया था, जिनकी थाप पर कभी बारातें नाचती थीं, जिनकी धुन पर कभी गांव-गांव में उत्सव मनाये जाते थे। लेकिन वक्त ने करवट बदली, डीजे के कानफोड़ू शोर ने इनकी मधुर लय को धुंधला कर दिया।
ढोल की थाप पर उम्मीदों की गूंज
सभा में बैठे वाल्मीकि कुमार की आंखों में बीते दिनों की तस्वीरें तैर रही थीं—जब उनके पंजाबी भांगड़ा ग्रुप के बीस लोग शादियों और उत्सवों में धूम मचाते थे। अब वह मायूसी से बोले, “साहब, डीजे ने हमारे ढोल की थाप को दबा दिया, हमारे बच्चों की रोटी छीन ली।” उनकी आवाज में एक कसक थी, लेकिन आंखों में उम्मीद भी थी कि प्रशासन उनका कोई सहारा बनेगा। नंदलाल, जो गढ़वा के मशहूर बिनाका बैंड के संचालक थे, बोले, “हमारी कला खत्म हो रही है, सरकार हमें लोन दिलवा दे तो हम अपने परंपरागत बैंड को फिर से खड़ा कर सकते हैं।” उनकी बात पर SDO ने सिर हिलाया, मानो भरोसा दिला रहे हों कि यह थाप फिर गूंजेगी। डंडा प्रखंड के मनोज रवि के चेहरे पर चिंता की लकीरें थी, “काम नहीं था तो गुजरात चला गया था, लेकिन जब सुना कि डीजे पर रोक लगी है, तो उम्मीद जगी और वापस चला आया।” अखिलेश, जो “राजा बैंड” के नाम से मशहूर थे, ने भी ऐसा ही दर्द बयां किया, “हमने ढोल-नगाड़ों की गूंज पर जिंदगी गुजार दी, लेकिन डीजे ने हमें बेरोजगार बना दिया।” महेंद्र राम की आवाज थरथरा गई, जब उन्होंने कहा, “हमारे बैंड परंपरा थे, रोजगार थे, लेकिन अब हालात ऐसे हो गये कि मेरे दो बेटों को बाहर कमाने भेजना पड़ा।” परिस्थितियां कितनी भी कठिन क्यों न हों, उम्मीद हमेशा जिंदा रहती है। खजूरी लगमा के सुनील कुमार ने दो महीने पहले ही अपने नये बैंड समूह की शुरुआत की थी। उनका कहना था, “डीजे बैन के बाद हमने फिर से ढोल पकड़ लिया, अब 20 लोगों को अपने साथ जोड़कर काम कर रहे हैं।” मेराल के अनिल राम ने एक और कड़वी सच्चाई बताई, “लोग डीजे के लिए हजारों-लाखों रुपये खर्च कर सकते हैं, लेकिन ढोल-नगाड़ों वालों को 2000 देना भी भारी लगता है।” इस बीच जरही के यमुना प्रसाद ने सबको एक जरूरी सलाह दी, “हमारी कला को बचाना है तो हमें काम के दौरान नशे से दूर रहना होगा, ताकि लोग हम पर भरोसा करें।”
प्रशासन ने दिखाई संवेदनशीलता
SDO संजय कुमार पूरे समय ध्यान से सबकी बातें सुनते रहे। कुछ शिकायती स्वर थे, कुछ उम्मीदों से भरी आवाजें, लेकिन एक बात साफ थी, गढ़वा की पारंपरिक संगीत संस्कृति को बचाने की पुकार थी, अंत में SDO ने भरोसा दिया, “आपकी समस्याओं पर यथासंभव पहल की जायेगी। रोजगार बढ़ाने के लिये योजनाओं से जोड़ा जायेगा और प्रशासन आपकी कला को संरक्षित करने के लिये प्रतिबद्ध रहेगा।” इसके बाद, उन्होंने सभी ढोल-नगाड़ा कलाकारों को सम्मान स्वरूप अंग वस्त्र भेंट किये। सभा कक्ष से निकलते हुए, कई चेहरों पर मुस्कान थी, तो कुछ की आंखों में आंसू थे—पर इस बार वे आंसू केवल दर्द के नहीं थे, बल्कि उस उम्मीद के थे, जो सालों बाद फिर से जागी थी। शायद फिर से गढ़वा की गलियों में ढोल-नगाड़ों की गूंज सुनाई देगी, शायद फिर से बारातों में भांगड़ा की थाप पर कदम थिरकेंगे… शायद फिर से परंपरा जीवित होगी।














