Kohramlive : सुबह की लालिमा के साथ जब गंगा और तालाबों के तटों पर सूरज की किरणें बिखरीं, तो हवा में आस्था का संगीत घुल गया। व्रती स्त्रियां सिर पर साड़ी का आंचल डाले, हाथों में डलिया लिये, निर्मल जल में स्नान कर तन-मन को पवित्र करतीं नजर आई। मिट्टी के चूल्हे पर लौकी की सब्जी, चने की दाल और भात की सौंधी खुशबू
जैसे हर घर को मंदिर बना गई। हर एक थाली में आत्मसंयम, शुद्धता और त्याग का स्वाद छिपा रहा। महापर्व छठ, बिहार-झारखंड की मिट्टी से उठकर अब पूरी दुनिया में बसे भारतीयों की पहचान बन चुका है। जहां कहीं भी उगता है सूरज, वहां झुकती हैं श्रद्धा की हथेलियां और सुनाई देती है वही पुकार, “जय छठी मइयां।”
खरना कल
दिनभर व्रती स्त्रियां न जल पीती हैं, न अन्न का स्पर्श करती हैं। संध्या ढले जब पहला तारा टिमटिमाता है, तो आंगन में दीपक की लौ में घुलती है दूध-गुड़ की खीर की मिठास। उसमें निहित होती है, भूख पर विजय और मन की तपस्या की महक। यहीं से आरंभ होता है 36 घंटे का निर्जला व्रत, जिसे मातायें, बहनें और बेटियां अपने परिवार की लंबी उम्र, सुख और समृद्धि के लिये अटल विश्वास के साथ निभाती हैं।
अस्ताचलगामी सूर्य को प्रणाम 27 को
संध्या के समय घाटों पर उमड़ती है श्रद्धा की बाढ़। नदी के जल में खड़ी व्रती महिलायें, सिर झुकाये, थरथराते दीपक थामे, डूबते सूर्य से अपने दुखों के अवसान की प्रार्थना करती हैं। सूर्यास्त की सुनहरी आभा में हर अर्घ्य में छिपी होती है
मां की ममता, बेटी की आस्था और बहन का विश्वास। आसमान पर बिखरती लालिमा मानो कहती है, “हर अंधकार का अंत होता है, हर तपस्या का फल।” सूर्यास्त का समय — 5.27 बजे शाम
उषा अर्घ्य : नये सवेरे की आराधना
भोर की पहली किरण जब क्षितिज को चूमती है, घाटों पर लोकगीतों की धुन के साथ वातावरण झंकृत हो उठता है।
“उग हो सूरज देव…” की गूंज मानो हर जीवन में नई ऊर्जा का संचार कर देती है। व्रती उगते सूर्य को अर्घ्य अर्पित कर
अपने व्रत का समापन करती हैं, पर यह अंत नहीं, नई शुरुआत है, जीवन, आशा और शक्ति की।सूर्योदय का समय सुबह 6.16 बजे।














