Delhi : दिल्ली हाई कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस यशवंत वर्मा से जुड़े कथित ‘जले हुये नोट’ मामले में सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को बड़ा फैसला सुनाया। सुप्रीम कोर्ट ने उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें मामले में FIR दर्ज करने और विशेष जांच दल (SIT) से अदालत की निगरानी में जांच कराने की मांग की गई थी। जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा और आलोक आराधे की पीठ ने याचिका पर सुनवाई से इनकार करते हुये कहा कि यह याचिका ‘सस्ती पब्लिसिटी’ के लिये दाखिल की गई प्रतीत होती है। अदालत ने कहा कि वह इस मामले में हस्तक्षेप नहीं करना चाहती।
याचिकाकर्ता ने उठाया था आपराधिक कार्रवाई का मुद्दा
याचिकाकर्ता वकील घनश्याम उपाध्याय ने दलील दी थी कि जस्टिस वर्मा के पद से इस्तीफा देने के बावजूद उनके आवास से कथित तौर पर बरामद बेहिसाब धन से जुड़ी आपराधिक जिम्मेदारी खत्म नहीं होती। याचिकाकर्ता की ओर से कहा गया कि इससे पहले इसी मामले में दायर याचिका तकनीकी आधार पर खारिज हुई थी, क्योंकि उससे पहले कोई शिकायत दर्ज नहीं की गई थी। अब शिकायत दर्ज किये जाने के बाद अदालत से हस्तक्षेप की मांग की गई थी। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने इन दलीलों को स्वीकार नहीं किया और याचिका को खारिज कर दिया।
क्या है ‘जले हुये नोट’ मामला?
मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, यह मामला 14 मार्च 2026 की घटना से जुड़ा है। आरोप है कि जस्टिस यशवंत वर्मा के सरकारी आवास पर आग लगने के बाद वहां कथित तौर पर जली हुई नकदी बरामद हुई थी। घटना के समय जस्टिस वर्मा और उनकी पत्नी घर पर मौजूद नहीं थे। घर में उनकी बेटी और बुजुर्ग मां के मौजूद होने की बात सामने आई थी। बाद में सामने आये एक वीडियो में कथित रूप से आग में जलते हुये नोटों के बंडल दिखाई देने का दावा किया गया। इस घटना के बाद जस्टिस वर्मा पर आरोप लगे, हालांकि उन्होंने इन आरोपों को खारिज करते हुये इसे खुद को फंसाने की साजिश बताया था। मामले को लेकर तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश ने आंतरिक जांच शुरू कराई थी। इसके लिये 22 मार्च को तीन सदस्यीय समिति का गठन किया गया था।इस समिति में पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश शील नागू, हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश जी.एस. संधावालिया, कर्नाटक हाई कोर्ट की न्यायमूर्ति अनु शिवरामन शामिल थे। समिति ने जांच शुरू करने के बाद अपनी रिपोर्ट तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश को सौंपी थी।
रिपोर्ट के बाद इस्तीफे या महाभियोग का विकल्प
आंतरिक समिति की रिपोर्ट के बाद जस्टिस वर्मा को इस्तीफा देने या हटाने की प्रक्रिया का सामना करने को कहा गया था। रिपोर्ट और संबंधित दस्तावेज राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री को भेजे गये थे। आरोपों के बाद उन्हें दिल्ली हाई कोर्ट से उनके मूल उच्च न्यायालय इलाहाबाद हाई कोर्ट वापस भेज दिया गया था और आगे की कार्रवाई तक उनका न्यायिक काम रोक दिया गया था। इसके बाद लोकसभा अध्यक्ष की ओर से जस्टिस वर्मा के खिलाफ आरोपों की जांच के लिये तीन सदस्यीय पैनल गठित किया गया था। इस प्रक्रिया के दौरान न्यायमूर्ति वर्मा ने पद से इस्तीफा दे दिया था। फिलहाल सुप्रीम कोर्ट के ताजा आदेश के बाद इस मामले में FIR और SIT जांच की मांग वाली याचिका पर विराम लग गया है।















