Chouparan(Krishna Paswan) : शाम ढल रही थी, आसमान सिंदूरी हो चला था और चौपारण की सड़कों पर एक अनकही पीड़ा उतर आई थी। चतरा मोड़ स्थित देवी मंडप के आंगन में, जहां आम दिनों में बच्चों की किलकारी गूंजती थी, आज वहां शोक की चुप्पी थी। हर चेहरा गंभीर, हर आंख नम… और हर हाथ में एक जलती हुई मोमबत्ती। चौपारण में कैंडल मार्च निकाला गया। यह सिर्फ एक मार्च नहीं था। यह 28 लपटों की कहानी थी, 28 चिराग़, जो आतंकवाद के अंधेरे में बुझा दिये गये थे। बैनर पर लिखे शब्द किसी नारे जैसे नहीं थे, बल्कि हर दिल की पुकार बन चुके थे, 28 शहीदों की शहादत व्यर्थ नहीं जायेगी, अब पूरा भारत बोलेगा – पाकिस्तान होश में आ।” युवाओं की आंखों में ग़ुस्सा था… महिलाओं की मौन उपस्थिति, जैसे कह रही हो “हम तुम्हें भूले नहीं हैं।” और पत्रकारों की कलम जैसे मोमबत्ती बनकर जल रही थी। प्रेस क्लब के पत्रकार शशि शेखर ने कहा कि शहीदों की कुर्बानी हमें कलम से लड़ना सिखाती है। आतंक के खिलाफ हमारी स्याही अब और तेज बहेगी।” व्यवसायी संघ के अध्यक्ष शंकर यादव की आवाज़ जैसे शंखनाद कर रही थी—हम नमन करते हैं उन वीरों को, जिनकी शहादत हमारी चुप्पी को भी हथियार बना गई।” कैंडल मार्च के दौरान “भारत माता की जय”, “वंदे मातरम्”, “शहीदों अमर रहो” के नारे सिर्फ आवाज नहीं थे, वो दिल से निकली चीखें थीं। छोटे बच्चे, महिलाएं, बुज़ुर्ग… सब तिरंगा लेकर चुपचाप आगे बढ़ते रहे। उस मौन में भी एक हुंकार थी। हर मोमबत्ती जैसे कह रही हो, तुम लौटोगे नहीं… पर तुम्हारा उजाला कभी नहीं बुझेगा।”
चौपारण में कैंडल मार्च, हर लौ में एक चीख थी…
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