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वक्त और हालात की पुकार… युद्ध विराम के ऐलान पर सोचें उग्रवादी

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Ranchi (Bhawna Thakur) : वक्त और हालात की पुकार यह है कि उग्रवादी और नक्सली युद्ध विराम का ऐलान कर दें। कोरोना महामारी के जहरीले कीड़े आम से लेकर खास तक के दिलो-दिमाग में कुलबुलाने लगे हैं। दुकान से लेकर सड़क तक सब सूना-सूना। महामारी की चोट ऐसी कि हर कुछ चौपट। धन, दौलत, शोहरत सबकुछ कोई काम का नहीं। जान पहचान भी बेकार। हॉस्पिटलों में बेड और ऑक्सीजन की कमी ऊपर से इंजेक्शन की कालाबाजारी। जोर का झटका धीरे से तब लगा जब अखबार के पन्नों में जगह पाकर समाज सेवा का दंभ भरने वाला राजीव कुमार सिंह वाकई में बड़का ब्लैकियर निकला। शर्म आती है इंसान कहने में भी।

वहीं राजधानी की सबसे बड़ी दवा की दुकान आजाद फार्मा और जय हिंद फार्मा में प्रशासन को ताला लगाना पड़ा। आरोप है कि यह दोनों दुकान के मालिक ऊंची कीमत टान रहे थे। सबका भला तब होता जब यहां सीलबंद तमाम जीवन रक्षक दवायें किसी काबिल और ईमानदार की देखरेख में भर्ती रोगियों के बीच मुफ्त में बंटवा देते। वहीं राज्य के सबसे बड़े अस्पताल रिम्स में बेड और वेंटिलेटर बेचते ऑडियो का वायरल होना। फिर स्थानीय प्रशासन द्वारा तीन लोगों को गिरफ्तार कर उन्हें जेल भेज देना। कलेजा छलनी कर जाती है ऐसी खबरें। झारखंड में उग्रवाद और नक्सलवाद को कुचलने और उन्हें रोकने के लिए सबसे बड़ी ताकत अर्धसैनिक बलों को झोंक रखी गई है जंगलों में। दिल रात चूहा-बिल्ली का खेल।

बीते रविवार को चक्रधरपुर के लोटापहाड़ और सोनवा के बीच रेलवे ट्रैक को आईआईडी विस्फोट कर उड़ा दिया गया। जिससे हावड़ा मुंबई रेल मार्ग बाधित हो गया। हॉस्पिटलों में ऑक्सीजन के बिना दम तोड़ते लोग। शासन और प्रशासन रेलवे ग्रीन कॉरिडोर बनाकर ऑक्सीजन सिलेंडर की सप्लाई करने में जुटा है। दमन के नाम पर रेलवे ट्रैक को उड़ा देना दुखद। कुछ जगहों पर लेवी नहीं मिलने पर हाईवा को भी फूंक देना गलत। अगर वाकई में उग्रवाद और नक्सलवाद का जन्म गरीब शोषित और पीड़ित लोगों की भलाई के लिए हो तो ऐसे समय पर इन्हें युद्ध विराम का ऐलान कर देना चाहिए।

अचानक आई विपदा से शासन की है नींद हराम और प्रशासन का फूल रहा दम। युद्ध विराम का ऐलान होने पर जंगलों में घांस, फूल-पत्ते को बूटों से रौंदने वाले कदमों को अपने गांव शहर की रखवाली में लगाया जा सकता है। हर जरूरी जगहों पर पहरा बैठाया जा सकता है। ताकि बाहर से पॉजिटिव होकर आने वाले लोगों को सेफ जोन में रखा जा सके। गांव के दलान पर बैठे बूढ़े बाबा और बच्चे सही सलामत रहें। गांव में फसल भी लहलहाते रहे। कोई भी कली खिलने से पहले ही ना मुरझा जाए। घर, बाहर हॉस्पिटल, दवा दुकान, रेलवे स्टेशन और एयरपोर्ट यहां तक कि घाट तक कड़ा पहरा हो सके और पूरा सिस्टम लगे वाह-वाह। यह रोना भी ना रहे कि चारों तरफ महामारी और झारखंड में हायतौबा का सबसे बड़ा गहरा घाव…

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