Hazaribagh : कहते हैं किसी की जिंदगी बचाने से बड़ा कोई पुण्य नहीं होता। हजारीबाग के एक साधारण से दिखने वाले इंसान ने इस बात को अपने जीवन से सच कर दिखाया है। उनका नाम है निर्मल जैन, जिन्हें पूरे शहर में लोग प्यार से “ब्लड मैन ऑफ हजारीबाग” कहकर बुलाते हैं। निर्मल जैन ने एक बार फिर इंसानियत की नई मिसाल कायम करते हुये 100वीं बार रक्तदान किया है। इस ऐतिहासिक उपलब्धि के साथ उन्होंने समाज को यह मजबूत संदेश दिया कि रक्तदान करने से शरीर को कोई नुकसान नहीं होता, बल्कि इससे स्वास्थ्य बेहतर रहता है और किसी जरूरतमंद की जिंदगी भी बचती है। हजारीबाग में निर्मल जैन का नाम सम्मान के साथ लिया जाता है। बताया जाता है कि अब तक वे प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से दो लाख से अधिक लोगों को रक्त उपलब्ध कराने में मदद कर चुके हैं। उनकी दिनचर्या भी अनोखी है। लगभग हर दिन वे ब्लड बैंक पहुंचते हैं और करीब दो घंटे वहीं बिताते हैं। उनका प्रयास रहता है कि शहर के अलग-अलग इलाकों में जाकर लोगों को रक्तदान के लिये प्रेरित करें और समय-समय पर ब्लड डोनेशन कैंप आयोजित करवायें। कभी स्कूल-कॉलेज में तो कभी भीड़भाड़ वाले बाजारों में खड़े होकर लोगों को रक्तदान के फायदे बताते हैं और उन्हें इस नेक काम के लिये आगे आने का आह्वान करते हैं।
एक घटना ने बदल दी जिंदगी
निर्मल जैन बताते हैं कि उनके जीवन की दिशा एक दर्दनाक घटना ने बदल दी। कई साल पहले एक सड़क दुर्घटना में घायल व्यक्ति को अस्पताल लाया गया था, लेकिन उसे रक्त देने के लिये कोई तैयार नहीं था। डॉक्टरों ने साफ कहा था कि अगर तुरंत रक्त नहीं मिला तो उसकी जान जा सकती है। ऐसे में निर्मल जैन आगे आये और रक्तदान किया। जब उस व्यक्ति की जान बची, तो उन्हें जो संतोष और खुशी मिली, उसी दिन उन्होंने ठान लिया कि जीवनभर रक्तदान करते रहेंगे। शुरुआत में साल में दो बार रक्तदान किया, फिर तीन बार और अब तय दिशा-निर्देशों के अनुसार हर तीन महीने में एक बार रक्तदान करते हैं। निर्मल जैन कहते हैं कि रक्तदान का एक बड़ा फायदा उन्हें खुद भी मिला है। उम्र के इस पड़ाव पर भी वे पूरी तरह स्वस्थ हैं और आज तक उन्हें अस्पताल के बेड पर नहीं सोना पड़ा। उन्होंने बताया कि हजारीबाग में 302 थैलेसीमिया मरीज पंजीकृत हैं, जिनमें कई छोटे-छोटे बच्चे भी शामिल हैं। इन बच्चों की जिंदगी बचाने के लिये नियमित रक्त की जरूरत पड़ती है। उनका कहना है कि रक्तदान सिर्फ एक सामाजिक जिम्मेदारी नहीं, बल्कि इंसानियत की सबसे बड़ी सेवा है।
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