Kohramlive : हर बुधवार की सुबह घर-घर में घंटियों की मधुर ध्वनि, अगरबत्ती की खुशबू और “ॐ गं गणपतये नमः” की गूंज, मानो खुद विघ्नहर्ता दरवाजे पर दस्तक दे रहे हों। हिंदू धर्म में बुधवार का दिन गणपति बप्पा को समर्पित माना जाता है। शादी हो, नया कारोबार हो या घर में कोई मांगलिक काम, सबसे पहले जिनका नाम लिया जाता है, वे हैं हमारे प्रिय भगवान गणेश जी। लेकिन आखिर 33 कोटि देवी-देवताओं में गणपति बप्पा को ही “प्रथम पूज्य” का सम्मान क्यों मिला? आइये, इस दिव्य कथा को दिल से महसूस करते हैं…
…और फिर हुआ अद्भुत निर्णय
पौराणिक कथा कहती है, एक समय देवताओं के बीच यह विवाद उठ खड़ा हुआ कि सबसे श्रेष्ठ कौन है? हर देवता खुद को प्रथम पूज्य कहलाना चाहता था। समाधान के लिये सभी देवता पहुंचे भगवान शिव और माता पार्वती के पास। महादेव ने मुस्कुराकर एक प्रतियोगिता रखी, “जो पूरे ब्रह्मांड की परिक्रमा कर सबसे पहले लौटेगा, वही प्रथम पूज्य कहलायेगा।” बस फिर क्या था, सभी देवता अपने-अपने वाहनों पर बैठ ब्रह्मांड की परिक्रमा को निकल पड़े। इस दौड़ में शामिल गणेश जी भी थे। मगर उन्होंने कुछ अलग किया, उन्होंने ब्रह्मांड की जगह अपने माता-पिता शिव और पार्वती की तीन बार परिक्रमा कर ली। जब देवता लौटे, तो महादेव ने गणेश जी को विजेता घोषित कर दिया। सब हैरान थे! तब बप्पा ने सरल शब्दों में कहा, “माता-पिता के चरणों में ही पूरा ब्रह्मांड बसता है।” उनकी यह बुद्धि, भक्ति और विनम्रता देखकर शिव-पार्वती प्रसन्न हो उठे और वरदान दिया, “हर शुभ कार्य से पहले सबसे पहले गणेश की पूजा होगी।” तभी से बप्पा ‘विघ्नहर्ता’ और ‘प्रथम पूज्य’ कहलाये।
बुधवार को ऐसे करें गणपति बप्पा को प्रसन्न
अगर जीवन की राह में बार-बार रुकावटें आ रही हैं, तो बुधवार का दिन खास है। सुबह स्नान के बाद गणेश जी की विधि-विधान से पूजा करें। 21 दूर्वा की गांठें अर्पित करें। “ॐ गं गणपतये नमः” मंत्र का जप करें। मोदक या गुड़ का भोग लगायें। मान्यता है कि ऐसा करने से जीवन की बाधाएं दूर होती हैं और घर में सुख-शांति का वास होता है।
बप्पा की पूजा, यानी हर काम में शुभारंभ की गारंटी
गांव की चौपाल से लेकर शहर के मंदिर तक, हर दिल में एक ही विश्वास बसता है, “पहले गणपति, फिर हर सफलता की शुरुआत।” यही वजह है कि हर शुभ काम से पहले बप्पा को याद करना हमारी परंपरा ही नहीं, आस्था की सबसे सुंदर मिसाल है।
Disclaimer : यह जानकारी धार्मिक मान्यताओं, पुराणों व लोकश्रुतियों पर आधारित है। पाठक इसे आस्था के रूप में लें, अंतिम सत्य मानकर निर्णय न करें।














