जैसा अन्न, वैसा मन, अन्नप्राशन संस्कार, जानें…

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  • Kohramlive : कभी आपने गौर किया है, जब घर में नन्हा शिशु पहली बार अन्न ग्रहण करता है, तो सिर्फ पेट नहीं भरता, पूरी परंपरा मुस्कुराती है। भारतीय संस्कृति के सोलह संस्कारों में अन्नप्राशन ऐसा ही पावन पड़ाव है, जहां बच्चे को पहली बार सिर्फ भोजन नहीं, बल्कि जीवन का संस्कार चटाया जाता है।

सोलह संस्कारों की पवित्र कड़ी: अन्नप्राशन

हिंदू धर्म में 16 संस्कार जन्म से लेकर मृत्यु तक जीवन को संस्कारित करने की प्रक्रिया हैं। इनमें अन्नप्राशन संस्कार शिशु के जीवन का पहला “आहार-संस्कार” माना जाता है। आमतौर पर शिशु के 6वें या 7वें महीने में शुभ मुहूर्त में मंत्रोच्चारण के साथ पहली बार सात्विक अन्न चटाया जाता है। यह सिर्फ खाने की शुरुआत नहीं, बल्कि शुद्ध आहार और शुद्ध विचारों के बीजारोपण का आध्यात्मिक क्षण होता है। शास्त्र कहते हैं, “अन्नं ब्रह्म”, यानी अन्न स्वयं ब्रह्म का स्वरूप है। अन्न से शरीर को ऊर्जा, मन को स्थिरता और बुद्धि को संतुलन मिलता है। शुद्ध, सात्विक भोजन से मन निर्मल और विचार सकारात्मक होते हैं। इसलिये भारतीय परंपरा में भोजन को सिर्फ स्वाद नहीं, संस्कार का विषय माना गया है।

आहार ही बनाता है विचार

जैसा भोजन, वैसा मन, यह केवल कहावत नहीं, गहरी आध्यात्मिक सच्चाई है। सात्विक आहार से धैर्य, करुणा और संयम जैसे गुण विकसित होते हैं। तामसिक भोजन से अशांति, क्रोध और असंतुलन बढ़ सकता है। अन्नप्राशन के समय परिवार यही संकल्प लेता है कि शिशु का जीवन शुद्ध, स्वस्थ और संतुलित बने। महाभारत में भी अन्न के प्रभाव का उल्लेख मिलता है। भीष्म पितामह ने द्रौपदी से कहा था कि दुर्योधन का अन्न खाने के कारण उनकी बुद्धि उस समय धर्म के पक्ष में नहीं बोल पाई। यह प्रसंग बताता है कि भोजन केवल शरीर नहीं, विचार और निर्णयों को भी प्रभावित करता है।

संस्कारित जीवन की पहली सीढ़ी

अन्नप्राशन शिशु के जीवन में संस्कारित जीवन का शुभारंभ है। इस दिन प्रार्थना की जाती है कि बालक तेजस्वी, स्वस्थ और सद्गुणों से परिपूर्ण बने। परिवारजन अन्न को भगवान का प्रसाद मानकर शिशु को चटाते हैं। अन्नप्राशन हमें याद दिलाता है कि जीवन की पहली थाली में सिर्फ चावल या खीर नहीं होती, उसमें मां की ममता, पिता का आशीर्वाद और संस्कृति की सदियों पुरानी सीख परोसी जाती है। और यही सीख कानों में फुसफुसाती है, “जैसा अन्न होगा, वैसा ही मन होगा और जैसा मन होगा, वैसा ही जीवन।”

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