Ormanjhi(Kuldeep/Amitabh) : ”कब किसी को क्या देना है, यह ईश्वर का काम। मैंने भी औरों की तरह ढेर सारा सपना संजोया था कि IAS या IPS या फिर कोई काबिल अफसर बन सकूं, पर नियति को कुछ और ही मंजूर था। बनारस, जयपुर और पटना में मूर्ति गढ़ने के बाद साल 2003 में झारखंड में अपनी किस्मत अजमाने को आ गया। यहां अच्छा रेस्पॉन्स मिला। मूर्ति बनाने का बहुत सारा ऑर्डर बाहर के राज्यों को मिल जाता है, अब झारखंड में ये काम बेखूबी हो रहा है।” यह कहना है झारखंड के मशहूर मूर्तिकार प्रेम किशोर द्विवेदी का। उन्होंने कहा कि बेशक, चाहे शख्स कोई हो, उन्हें अपने पथ पर डिगना नहीं है। मेहनत, जुनून और जज्बा हो तो किस्मत भी साथ दे जाती है। शहीदों की प्रतिमा से लेकर देवी-देवताओं की मूर्तियां गढ़ने वाले प्रेम किशोर द्विवेदी रांची से सटे ओरमांझी के काली मंदिर लेन बाजार टांड में जयपुर मूर्ति भंडार के मालिक हैं, एक छोटे से गांव में अपने हुनर का जलवा बिखरने वाले प्रेम किशोर द्विवेदी क्या बोल गये, सुनें…








