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26 टूटे हुये संसार, मंगलसूत्रों का शमशान बन गया

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Kohramlive : जहां कभी टट्टुओं की टापें गूंजती थीं, बच्चे पापा की उंगली थामे बर्फ में दौड़ते थे…आज वहीं बायसरन की वादियों में खामोशी पसरी है। उस खामोशी में गूंज रही है एक साथ 26 विधवाओं की कराह…हां, पहलगाम की धरती आज मातम में लिपटी है। 3 बजे की दोपहर, जब सूरज वादी के माथे पर मुस्कान बन कर चमक रहा था, उसी वक्त, सेना की वर्दी पहने भेड़िये बायसरन की हसीन घाटियों में घुसे। टट्टू पर बैठे, गोलगप्पे खाते, खिलखिलाते सैलानियों की तस्वीरें अचानक खून से रंग गईं। “तुम हिंदू हो?” एक लहजा, एक सवाल…और फिर धांय-धांय-धांय… जिंदगी जवाब देने से पहले ही गिर पड़ी। शुभम द्विवेदी, कानपुर का नवविवाहित दूल्हा, अब पत्नी, ऐशन्या, मंगलसूत्र को सीने से लगाकर रो रही है। “वो कहता था, पहलगाम का सूरज हमारी नई शुरुआत होगा, लेकिन मैं अकेली लौट रही हूं…” समीर गुहा, कोलकाता से, जो अपनी बेटी और पत्नी के साथ आये थे। अब उसकी पत्नी शबरी, हाथों की चूड़ियां तोड़ चुकी है। “मैंने तो सोचा था अब साथ में रामेश्वरम जायेंगे, अब कौन ले जायेगा मुझे?” लेफ्टिनेंट विनय नरवाल – करनाल का जवान अफसर, अपनी नई नवेली दुल्हन हिमांशी के साथ पहलगाम हनीमून मनाने गया था। अब हिमांशी की सांसें उन्हीं वादियों में अटक गई हैं, “मेरा पूरा संसार चला गया।” यतीश परमार और बेटा सुमित – भावनगर से आये थे…अब घर लौटा है एक ही ताबूत, जिसमें बाप-बेटे दोनों की तस्वीरें चिपकी हैं। हर घर में तीर्थ का नाम लेकर निकले लोग आज ताबूत में लिपटे मिले। बायसरन, जो कभी नवविवाहित जोड़ों का सपना था, आज विधवा मंगलसूत्रों का शमशान बन गया। दिल को झकझोर देने वाले इस वारदात को जिसने भी देखा, सुना और जाना वो फूट-फूटकर यहीं कह रहा है, “पाकिस्तान, तू सिर्फ जमीन नहीं छीनता, तू मां की गोद, बहन की राखी और बच्चे का भविष्य लील जाता है।” “ये हमला नहीं, एक सामूहिक बलात्कार है हमारी खुशियों का।” सैफुल्लाह खालिद, लश्कर का वही भेड़िया, जिसे पाकिस्तानी फौज फूलों से स्वागत करती है… जिसने टोपी पहन कर जिहाद बोया और फसल काट ली बायसरन की मासूम वादियों में। आसिफ फौजी, सुलेमान शाह एवं अबु तल्हा ये चेहरे अब खून के निशान हैं।

 “क्या टूरिज्म हमारा अपराध था?

क्या गलती थी उस बच्चे की, जिसने जिद की थी – “पापा, बर्फ वाला पहाड़ देखना है।” या उस मां की, जो बोली, “कैंसर की दवा से अच्छा, यहां की हवा है।” क्या कसूर था उन युवाओं का, जो शादी के बाद “पहलगाम” को अपनी प्रेमगाथा की शुरुआत मान बैठे थे? बर्फ नहीं गिरी थी उस रोज़, मगर पूरा भारत ठिठुर गया। वो लहू जो पहलगाम की मिट्टी में बहा, अब तिरंगे की गरिमा बन चुका है।

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