Ranchi : वरिष्ठ साहित्यकार एवं साहित्य अकादमी झारखंड के सदस्य महादेव टोप्पो ने कहा कि आज की आदिवासी युवा पीढ़ी को आदिवासियों से जुड़े साहित्य एवं कथाओं को पढ़ना चाहिए ताकि वे दिशा हीन ना हों। युवा अपनी पुरानी आदिवासी परंपरा से कटकर दिशाहीन हो रहे हैं। उन्हें अपनी पुरानी परंपराओं से जुड़ने की ज़रूरत है। इसके लिए पूर्वजों द्वारा लिखी गये साहित्यों को पढ़ने की ज़रूरत है। महादेव टोप्पो ने पुरखों द्वारा लिखी गई साहित्य एवं कथाओं के बारे में विस्तार से जानकारी दी। मौका था झारखंड आदिवासी महोत्सव 2023 में आयोजित ट्राइबल लिट्रेचर सेमिनार का। सेमिनार के पहले दिन आदिवासी साहित्य में कथा और कथेतर विधाओं (गैर-काल्पनिक शैलियां) का वर्तमान परिदृश्य के बारे में चर्चा की गई। महादेव टोप्पो सेमिनार में मुख्य वक्ता के तौर पर बोल रहे थे।
देश के विभिन्न राज्यों से आये विशेषज्ञों ने रखे अपने विचार
प्रयागराज से आयी प्रोफेसर जनार्दन गोंड ने आदिवासी के जीवन दर्शन के बारे में विस्तार से बताया। आदिवासी के ज्ञान के बारे में चर्चा की। उनमें प्रकृति को ले कर जागरूकता के बारे में बताया साथ ही प्रकृति से सामंजस्य पर प्रकाश डाला। वहीं मणिपुर विश्वविद्यालय से आयी प्रोफेसर ई विजयलक्ष्मी ने आदिवासी दर्शन में उनके ज्ञान के बारे में जानकारी दी। उन्होंने कहानी एवं उपन्यास के माध्यम से आदिवासियों की जीवनी के बारे में विस्तार से प्रकाश डाला। वहीं त्रिपुरा से आयीं प्रोफेसर मिलन रानी चमातिया ने भी आदिवासी भाषा, जीवन दर्शन के बारे में चर्चा की। उन्होंने भी कहानी एवं उपन्यास के माध्यम से उनके जीवन संघर्ष, शिक्षा के बारे में जानकारी दी। उन्होंने त्रिपुरा के आदिवासी के जीवन संघर्ष, जीवन दर्शन, इतिहास और उनकी संस्कृति के बारे में विस्तार से चर्चा की। उन्होंने कब्रक उपन्यास के माध्यम से त्रिपुरा सहित देश के विभिन्न क्षेत्रों के आदिवासियों के बारे में चर्चा की।

विश्व आदिवासी दिवस के अवसर पर रांची के बिरसा मुंडा मेमोरियल पार्क में जहां एक ओर सांस्कृतिक कार्यक्रम से आदिवासी जीवन दर्शन को समझने का मौका मिल रहा है, तो वहीं दूसरी ओर इसी पार्क में परिचर्चा के जरिये देश के कोने-कोने से आये जाने-माने विशेषज्ञों से जनजातीय भाषाओं, संस्कृति और परंपराओं सहित जनजातीय साहित्य, इतिहास, जनजातीय दर्शन के महत्व के बारे में जानकारी मिल रही है। इसी क्रम में ट्राइबल लिट्रेचर सेमिनार का भी आयोजन किया गया है।
सेमिनार के पहले दिन का समापन दिल्ली विश्वविद्यालय से आयी प्रोफेसर स्नेह लता नेगी की चर्चा से हुआ। उन्होंने आदिवासी साहित्य की परंपरा एवं कथा के बारे में विस्तार से बताया। उन्होंने बताया कि झारखंड कथा एवं साहित्य के संदर्भ में बेहतर रहा है यहां कई साहित्यकार एवं कथाकार हुए हैं। आदिवासियों के जीवन दर्शन, संस्कृति एवं उनकी परंपरा को जानने एवं समझने के लिए पूर्वजों द्वारा लिखी गई साहित्य को पढ़ने एवं समझने के साथ-साथ उसे अपनी जीवन में आत्मसात करने की आवश्यकता है।
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